समीक्षा, कसप~ मनोहर श्याम जोशी

‘कसप’ उपन्यास सन् 1982 में प्रकाशित हुआ जिसके लेखक हैं – मनोहर श्याम जोशी। ‘कसप’ एक कुमाऊंनी शब्द है जिसका मूलतः अर्थ हैं -‘क्या जाने? ‘ या ‘क्या पता?’ उपन्यास की शुरुआत कुमाऊंनी हिंदी के कुछ शब्दों का अर्थ बताते हुए होती है। इस उपन्यास को आंचलिक उपन्यास की श्रेणी में रखा जा सकता है क्योंकि इसकी कथा-भूमि कुमाऊंनी क्षेत्र के इर्द-गिर्द घूमती सी नजर आती है।

‘कसप’ उपन्यास की मूल संवेदना-

यह कथा यदि सतही रूप से देखी जाए तो केवल एक प्रेम – कहानी जिसका अंत दुखांत हैं, ऐसी प्रतीत होगी। परन्तु ये इससे कही अधिक विस्तृत है। कहानी के नायक है – देवीदत्त तिवारी जो अपने नाम को गैर-रूमानी समझने के कारण स्वयं को डी. डी. नाम से कहना-कहलाना पसन्द करता है। नायिका का नाम है – मैत्रेयी शास्त्री जो कि घर में सबसे छोटी है। जिस वजह से उसे ‘ बेबी’ नाम दिया गया है। नायिका अपने नाम को सार्थकता प्रदान करती हुई उपन्यास में दिख जाएगी।

इस कहानी के नाम के साथ – साथ इसमें घटित घटनाएं, प्रतिक्रियाएं भी विचित्र-सी जान पड़ती है। अधिकतर उपन्यासों, कहानियों, फिल्मों आदि में नायक और नायिका का प्रथम साक्षात्कार घाट, बगीचे आदि में होता है। परन्तु इस कथा में नायक और नायिका की पहली मुलाकात अस्थाई शौचालय में होती है। कथा में ऐसी अनेक विचित्र घटनाएं देखने को मिल जाएंगी, जैसे –
* नायिका के पैर पर चाय गिरने पर नायिका द्वारा उसके पैर के अंगूठे को चूसे जाने के लिए कहना।
* गणनायक मंदिर में हुई घटनाएं।

ऐसी अनेक घटनाओं से उपन्यास भरा हुआ है। परन्तु ये कहा जाना कि ये घटनाएं कथा को फ़हहाशी की तरफ ले जाती है, कथा के साथ नाइंसाफी करने जैसा होगा। ये घटनाएं कहानी को और नैसर्गिक बनाती है।

डी. डी. एक व्यावसायिक दिग्दर्शक के साथ – साथ एक साहित्य प्रेमी है। नायिका उसकी एकदम विपरीत है जिसका पढ़ाई से कोई लेना-देना नहीं है। डी.डी. जिसका नाम ही देवदास से प्रेरित नज़र आता है, उसके चरित्र और कहानी के बारे में अनेक बातें सामने लाती है। डी. डी. ने प्रेम के बारे में पढ़ा और सुना जरूर था, परन्तु कभी किया नहीं था (कुछ अपवाद कथा के मिल जाएंगे, पर ध्यान दीजिए वे केवल अपवाद है)।

नायक ये समझता है कि प्रेम एक थीसिस जैसा है जिसे मस्तिष्क से समझा जा सकता है। लेकिन प्रेम तो बस हो जाता है जिसे समझना अच्छे-अच्छों के बस की बात नहीं। परन्तु डी.डी. तो ठहरे कथा के नायक। वहीं दूसरी तरफ, नायिका ने ना प्रेम के बारे में पढ़ा और ना सुना और किया….. ऐसा शुरुआत में तो कतई नज़र नहीं आता है। परन्तु कथा के आगे बढ़ते-बढ़ते कोहरे की परत-दर-परत हटती-सी दिखती है।

डी.डी. और बेबी की प्रेम कहानी में बेबी के पिता की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। डी.डी. और बेबी के बीच हो रहे पत्र-व्यवहार में वे एक मध्यस्त-जैसा व्यवहार करते हैं। शास्त्री जी स्वयं प्रेम कर चुके हैं शायद, इस वजह से प्रेम को थोड़ा -बहुत समझते भी हैं। परन्तु जैसा बताया जा चुका है कि प्रेम कहानी का अंत दुखांत है, इसलिए सब कुछ अच्छा- अच्छा होने की आशा दिल से निकाल दीजिए।

नायक मुंबई और नायिका बनारस में हैं। नायिका के घर में विरोध होता है( नायक के घर में विरोध होना असंभव है क्योंकि उसका कोई घर नहीं), नायक को कुत्तों की तरह पीटा जाता है, बेइज्ज़त किया जाता है, नायिका की शादी कहीं और तय कर दी जाती है। ऐसी अनेक घटनाओं के बावजूद भी नायक और नायिका साथ बने रहे।

जिस प्रकार ओज़ोन-परत को क्षतिग्रस्त किसी बाह्य नहीं अपितु आंतरिक पदार्थ ने किया उसी तरह नायक और नायिका के आपसी मतभेद से कथा अचानक उलट-पलट हो जाती है। नायिका नायक को दिल्ली में उसके साथ रह कर पढ़ने की बात कहती है जबकि नायक विदेश जाकर पढ़ना चाहता है। और यहीं कथा देवदास और डी.डी. को एक तराजू पर रखती है। जिस प्रकार देवदास अहम् में आकर विकल्पों में से गलत की तरफ भागता है, उसी तरह ‘कसप’ उपन्यास का नायक भी यही करता है।

ये तो हुई प्रेम की बात लेकिन यह कथा केवल प्रेम पर नहीं अपितु अस्तित्वाद और स्वीकरण पर आधारित-सी जान पड़ती है। डी.डी. का कथा की शुरुआत में निराशावादी होना, सच्चाई से मुंह मोड़ लेना अंत में जाकर अपने दुखों और सांसारिक उत्पीड़न को स्वीकार कर लेना एवं चट्टानों पर बैठ कर आंसू की तरह अपनी पीड़ाओं और बेबी की यादों के साथ-साथ अपनी पारिवारिक अवस्थिति को।

खुद से बाहर निकालना उसके अस्तित्व के एक नव-आविर्भाव की शुरुआत है। नायिका भी इस कहानी में उतनी भूमिका निभाती है जितना कि नायक। नायिका को भी शुरुआत में लापरवाह दिखाया जाता है परंतु कथा के अंत में वह नायक से अधिक व्यवस्थित नज़र आती है। नायक के अस्तित्व की खोज में गुलज़ार और नायिका के लिए शास्त्री जी एक उत्प्रेरक की भांति भूमिका निभाते हैं।
अंत में बस यही की “जाने देने का नाम ही जिंदगी है।” शायद इसी वजह से क़ुबलर रॉस मॉडल में भी स्वीकृति (acceptance) अंतिम चरण है।

~दिशा, हिन्दी. आनर्स, ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज 

समीक्षा, जूठन ओमप्रकाश वाल्मीकि…https://bhojkhabar.com/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a5%82%e0%a4%a0%e0%a4%a8-%e0%a4%93%e0%a4%ae%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b6-%e0%a4%b5%e0%a4%be/

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