
प्रेमचंद जी का पृथ्वी पर अवतरण 31 जुलाई 1880 वाराणसी के लमही नामक गांव में हुआ। उनके पिता लमही में डाक मुंशी थे. मुंशी प्रेमचंद का मूल नाम धनपत राय था। हिंदी जगत प्रेमचन्द मुख्यतः कथाकार और गद्यकार के रूप में सामने आते हैं। वे कथा-साहित्य के सम्राट् हैं। आधुनिक युग-जीवन एवं जन-चेतना की प्रत्येक हिलोर उनके साहित्य में लहरा उठी है।
प्रेमचन्द ने ‘सेवासदन’ (1918 ई०), ‘वरदान’ (1921 ई०), प्रेमाश्रम’ (1921 ई०), ‘रंगभूमि’ (1925 ई०), ‘कायाकल्प’ (1926 ई०), ‘निर्मला’ (1927 ई०), ‘प्रतिज्ञा’ (1929 ई०), ‘गबन’ (1931 ई०), ‘कर्मभूमि’ (1932 ई०), ‘गोदान’ (1936 ई०), ‘मंगलसूत्र’ – कुल ग्यारह महत्त्वपूर्ण उपन्यास लिखे। इन सभी उपन्यासों में प्रेमचन्द ने समय के साथ चलने का प्रयत्न किया है। सबका वर्तमान जीवन की समस्याओं से सम्बद्ध हैं।
‘सेवासदन’ प्रेमचन्द का पहला उपन्यास है। हिन्दी जगत् में इसका अच्छा स्वागत हुआ था। इस उपन्यास में प्रेमचन्द ने वेश्याओं के सुधार की समस्या उठायी है। इस उपन्यास में भारतीय नारी की पराधीनता को दिखाया गया है। इस प्रधान समस्या के साथ-साथ अन्य छोटी-बड़ी समस्याओं को भी दिखाया गया है।
‘दहेज की समस्या’, ‘अनमेल विवाह’, ‘सामाजिक रूढ़ियाँ’, ‘पुलिस वर्ग के ‘कारनामे’ आदि विषयों को उपन्यास मे बखूबी दिखाया गया है। इस उपन्यास के माध्यम से ‘वेश्या जीवन में सुधार’ का समाधान लेखक ने सेवासदन मे दिखाया है। कला की दृष्टि से यह प्रथम कृति पर्याप्त सुन्दर है।
‘वरदान’ उर्दू में लिखे गये एक परिहास-प्रधान उपन्यास ‘जलवसए ईसार’ का, जिसकी रचना प्रेमचन्द ने ‘सेवासदन’ से भी पहले की थी, हिन्दी-रूपान्तर है। हिन्दी-जगत् ने इसका स्वागत नहीं किया।
‘प्रेमाश्रम’ में प्रेमचन्द ने जीवन के विशाल चित्रपट को सामने रखा। ‘सेवासदन’ में वे नगर की गलियों में ही चक्कर लगाते रहे; किन्तु ‘प्रेमाश्रम’ में उनका ध्यान भारतीय ग्रामीण जीवन की विषमताओं पर केन्द्रित हुआ। इसमें किसानों की दुरवस्था, जमींदारों का अत्याचार, बड़े तालुकेदारों का विलासमय जीवन, वकीलों की बेरहमी, पटवारियों, कारिन्दों और मुंशियों के काले कारनामे, पुलिस की ज्यादती, अदालतों की पोल, अफसरों की धाँधली आदि प्रेमचन्द की कुशल लेखनी से मूर्त हो उठे हैं।
प्रेमचन्द इस उपन्यास में भी एक महत्त्वपूर्ण घोषणा करते हैं-” भूमि या तो ईश्वर की है जिसने इसकी सृष्टि की या किसान की जो ईश्वरीय इच्छा के अनुसार इसका उपयोग करता है।” यह घोषणा आज भी जन-चेतना के जागरण के इतिहास में महत्त्वपूर्ण है। किसानों की दुरवस्था का समाधान उन्होंने लखनपुर ग्राम में ‘प्रेमाश्रम’ की स्थापना द्वारा प्रस्तुत किया है।
इस कल्पना को मूर्त करने के लिए प्रेमचन्द ने जो नुस्खा दिया है वह बहुत सस्ता है। अमेरिका से उदात्त भावनाएँ लेकर आये हुए प्रेमशंकर का प्रयत्न सारी समस्याओं का समाधान बन जाता है। उनके प्रयत्न से लोभी और निर्मम डॉक्टर प्रियानाथ, घूसघोर थानेदार दयाशंकर, स्वार्थी वकील डॉक्टर इर्फान अली, कठोर शासक ज्वाला सिंह सभी जनता के सच्चे सेवक बन जाते हैं। इतना बड़ा हृदय-परिवर्तन सहज नहीं। निश्चित है कि यहाँ भी प्रेमचन्द अपने युग के सुधारवादी दृष्टिकोण से ऊपर नहीं उठ सके हैं।
‘कला की दृष्टि से ‘प्रेमाश्रम’ का पूर्वार्द्ध बहुत सफल है। ग्राम्यजीवन का इतना बड़ा कलाकार सम्भवतः भारत की अन्य किसी भाषा में नहीं है। उत्तरार्द्ध में घटनाओं को समेटने में प्रेमचन्द अधिक सफल नहीं हुए हैं। मनोहर की आत्महत्या, विद्यावती का विष खाकर प्राण देना, गायत्री का अन्त, तेजू और पद्म की तन्त्र-साधना में मृत्यु, यह सब कुछ कथानक
को शीघ्र समेटने के प्रयत्न में दिखाया गया है। इस प्रकार विरोधी पात्र या तो सुधर गये हैं या चुपचाप मृत्यु के शान्त अञ्चल में छिप गये हैं। कथानक का इस प्रकार अन्त कर देना प्रौढ़ कलाकार के लिए चुनौती है।
रंगभूमि
‘रंगभूमि’ भारतीय जन-जीवन का रंगमंच है। वर्तमान युग जीवन के सभी प्रतिनिधि पात्र इस मंच पर सच्चा अभिनय करते हैं। यह कृति प्रेमचन्द की विराट् उद्भावना है। इसमें कलाकार ने मुख्यतः औद्योगिक समस्या के दुर्गुणों की ओर एक सच्चे आदर्शवादी की तरह दृष्टिपात किया है। ‘रंगभूमि’ में एक साथ औद्योगिक और कृषि जीवन की तुलना, पूँजी- केन्द्रीकरण का विरोध, औद्योगिक सभ्यता का विरोध, व्यक्ति के अधिकारों की सुरक्षा, धार्मिक रूढ़िवादिता का विरोध, राष्ट्रीय स्वातंत्र्य के लिए जनान्दोलन का समर्थन, देशी राज्यों की राजनीति, अंग्रेजी साम्राज्यवाद की नकली और थोथी आदर्शवादिता, यह सब कुछ मूर्त हो उठा है।
इस जीवन के मंच पर हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पादरी, राजा, कुँवर, दीवान, जमींदार, किसान, मिल-मालिक, मजदूर, पण्डे और गुण्डे, देशसेवी, आत्मसेवी और आत्मदर्शी सभी ने अपना-अपना अभिनय किया है।
इस उपन्यास में प्रेमचन्द का कला बोध अधिक सजग है। कथा के कलात्मक विकास में भी उन्होंने अस्वाभाविकता नहीं आने दी है। आलोचकों की दृष्टि में प्रेमचन्द ने इस उपन्यास में पहली बार चरित्र प्रधान उपन्यास लिखने में सफलता प्राप्त की है। सूरदास का चरित्र प्रेमचन्द की अनुपम सृष्टि है।’सूरदास’ को गांधी का ही दूसरा रूप मानते हैं।’
कायाकल्प
‘रंगभूमि’ की सफलता के बाद प्रेमचन्द ने अध्यात्मभूमि का कोना भी झाँकना चाहा; किन्तु आवागमन के चक्कर में बुरी तरह फँस गये। ‘कायाकल्प’ में यही गोरखधन्धा देखा जा सकता है। जगदीशपुर की रानी देवप्रिया की विलास- चेष्टाएँ अतृप्त हैं। यह अतृप्ति असीम और अनन्त है।
कर्मभूमि
‘कर्मभूमि’ में वे नागरिक और ग्रामीण दोनों जीवन धाराओं में राजनीतिक चेतना फूँकना चाहते हैं। शहर की क्रान्ति का नेतृत्व डॉ० शान्तिकुमार तथा सुखदा ने किया है। गाँवों का आन्दोलन अमरकान्त और आत्मानन्द के द्वारा सञ्चालित किया गया है। मन्दिर में अछूतों का प्रवेश निषेध, महन्तों का आडम्बर और भोगलिप्सा, जनता का अन्धविश्वास, मदिरा सेवन तथा अनैतिकता आदि सामाजिक और धार्मिक समस्याओं के साथ ही कलाकार ने मजदूरों और किसानों को होनावस्था, सरकारी दमन, पूँजीपतियों का शोषण आदि राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं को भी उठाया है।
उपन्यास के अन्त में प्रेमचन्द ने पाँच आदमियों की ऐसी कमेटी बनायी है जिसके सुझाव सरकार को मान्य होंगे। इस आधार पर वे समस्याओं को सुलझाना चाहते हैं। सम्भवतः इस कमेटी सम्बन्धी धारणा के मूल में सन् 1931 ई० का गाँधी-इरविन समझौता कार्य कर रहा था। इसके बावजूद इस उपन्यास में स्थितियों और घटनाओं के चित्रण में प्रेमचन्द का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत यथार्थवादी है। मुन्नी, सुखदा, सलोनी और नैना जैसे नारी पात्रों के चित्रण में उन्हें विशेष सफलता मिली है। इस उपन्यास में प्रेमचन्द ने गरीब, शहरी और ग्रामीण जनता का यथार्थ चित्र खींचा है और उनके प्रति पाठक को सहानुभूति जागृत की है।
गबन
गबन में प्रेमचन्द ने पारिवारिक जीवन का मनोवैज्ञानिक चित्र उपस्थित किया है। नारी की आभूषणप्रियता और पुरुष का आत्मप्रदर्शन मध्यवर्गीय समाज की इन दोनों ग्रंथियों को पति-पत्नी के जीवन में चरितार्थ करते हुए प्रेमचन्द ने बड़ी ही सघन और स्वाभाविक कथा-सृष्टि की है। प्रथम बार प्रेमचन्द ने पात्रों में अन्तर्द्वन्द्र उपस्थित किया है। परिस्थितियों के भंवरजाल में पड़कर व्यक्ति को संघर्ष करते हुए दिखाया है। व्यक्ति की दुर्बलताओं को प्रत्यक्ष किया है। उपन्यास के उत्तरार्द्ध में पुलिस, न्यायालय तथा वेश्या-जीवन पर भी प्रकाश डाला गया है। वस्तुतः कथानक के दो केन्द्र हो गये हैं। ‘प्रयाग’ से सम्बन्धित कथानक पूर्णतः पारिवारिक है। ‘कलकत्ते’ का घटनाचक्र राजनीतिक और सामाजिक जीवन को भी समेट लेता है।
उपन्यास के अन्त में प्रेमचन्द का सुधारवाद इस उपन्यास में भी स्वर्ग बनकर सामने आ गया है। सभी पात्रों को उन्होंने अनासक्त और कर्मयोगी बना दिया है।
निष्कर्ष-
उपर्युक्त अध्ययन के पश्चात हम यह कह सकते हैं कि प्रेमचंद के उपन्यास तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक समस्याओं को लेकर लिखे गए थे। और वर्तमान युग में प्रेमचंद भी उपन्यास प्रासंगिक हैं। आज भी वही समस्याएं विद्यमान है जो आज से 100 साल पहले तबके तत्कालीन समाज में विद्यमान थे।
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