
हम सभी ने जीवन में कोई ऐसी कहानी, नाटक, उपन्यास, कविता या साहित्य कि कोई अन्य विधा जिसको पढ़कर या सुनकर मन और आत्मा को एक अटूट और प्रीतम आनंद की अनुभूति अवश्य प्राप्त हुई होगी। कभी आपने सोचा है कि उसे साहित्यिक रचना में ऐसा क्या था? जिसको आप पढ़कर आनंद और उत्साह से भर गए। साहित्य के विचारकों ने इसी अनुभूति को रस कहा है। साहित्य या काव्य को पढ़ने या सुनने या नाटक को देखने से जो आनंद हमें प्राप्त होता है उसी को भारतीय साहित्यशास्त्र में रस कहा गया है। वैसा आनंद और सुख इस भौतिक जगत में व्याप्त वस्तुओं से भी नहीं प्राप्त हो सकता। जो हमें साहित्यिक रचना को पढ़कर प्राप्त होता है। साहित्य अध्ययन का आनंद हमें व्यक्तिगत लाभ, मानसिक संकीर्णता और राग-द्वेष से मुक्त रखना है। तब व्यक्ति अपना हित न सोचकर पूरे समाज का हित सोचता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने आनंद के इस अनुभव को हृदय का मुक्ताअवस्था कहा है। प्राचीन आचार्यों ने इस अनुभव की तुलना योगियों की समाधि के अनुभव या ब्रह्मानंद से भी की है।
रस के चार अंग हैं-स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव।
इस पृथ्वी पर जो भी मानव जन्म लेता है। उसके अंदर जन्म से ही कुछ स्थायी भाव रहते हैं जैसे- प्रेम, करुणा, दुख, खुशी, क्रोध, आश्चर्य आदि भाव व्यक्ति के अंदर जन्म से ही होते हैं। जैसे ही हम इन भावों को समझने लगते हैं। इन भावों से संबंधित कारण को पढ़कर, सुनकर देखकर जब हमारे अंदर के दबे हुए यह स्थायी भाव जागृत होते हैं। इन्हीं को स्थायी भाव कहा जाता है।
साहित्य विचारकों ने मुख्यतः दस स्थाई भाव माने हैं। रति (स्त्री और पुरुष का प्रेम) हास, शोक (दुख), क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा (घृणा), विस्मय (आश्चर्य), निर्वेद (वैराग्य या शांति) तथा वात्सल्य (अपने से छोटों के प्रति प्रेम)
हमारे मन में जिस कारण से स्थाई भाव की उत्पत्ति होती है उसे विभाव कहते हैं। विभाव दो प्रकार के होते हैं आलंबन विभाव तथा उद्दीपन विभाव
आलंबन विभाव उस कारण को कहते हैं जिस पर स्थाई भाव अवलंबित रहता है। आलंबन विभाव के भी दो प्रकार हैं आश्रय और विषय
आश्रय का मतलब होता है कि जिस व्यक्ति के अंदर रति शोक क्रोध आदि स्थाई भाव उत्पन्न होते हैं उसे आश्रय कहते हैं।
विषय का अर्थ है जिस व्यक्ति अथवा वस्तु के प्रति व्यक्ति(आश्रय) के मन में रति क्रोध शोक आदि अस्थाई भाव उत्पन्न होते हैं उसे विषय कहते हैं विषय का दूसरा नाम आलंबन भी है।
आश्रय और विषय को हम एक उदाहरण के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे जब भगवान लक्ष्मण को शक्तिमान लग जाता है और वह मूर्छित होकर गिर जाते हैं तब प्रभु श्री राम उनके पास बैठकर रोने लगते हैं। यहां पर प्रभु श्री राम आश्रय हैं। लक्ष्मण विषय अथवा आलंबन हैं। क्योंकि लक्ष्मण को मूर्छित अथवा घायल हालत में देखकर उनके मन में शोक रूपी स्थाई भाव उत्पन्न है।
आश्रय और विषय (आलंबन) इन दोनों को आलंबन विभाव कहते हैं।
से तात्पर्य है जो आलंबन द्वारा उत्पन्न भाव को उद्दीप्त करते हैं अर्थात उसे गति प्रदान करते हैं उन्हें उद्दीपन विभाग कहते हैं।
उद्दीपन विभाव के दो भेद हैं बाहर का वातावरण और आश्रय या आलंबन की बाहरी चेष्टाएं।
उद्दीपन विभाग को हम एक उदाहरण के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं जैसे एक व्यक्ति सुनसान जंगल में काली अंधेरी रात में जा रहा है अचानक से उसने एक शेर देख लिया और उसे शेर को देखकर वह भयभीत हो गया। यहां पर व्यक्ति आश्रय कहलाएगा। क्योंकि उस व्यक्ति के अंदर शेर को देखकर भय रूपी स्थाई भाव उत्पन्न हुआ। अब प्रश्न उठता है कि किसको देखकर व्यक्ति के मन में भय रूपी स्थाई भाव उत्पन्न हुआ? तो हमारा उत्तर होगा शेर को देखकर तो यहां पर शेर विषय है या कहे तो आलंबन है।
दो कारण व्यक्ति के अंदर भय रूपी स्थाई भाव को और अधिक तीव्र गति प्रदान करते हैं। वह है बाहरी वातावरण अर्थात सुनसान और अंधकार पूर्ण जंगल। दूसरा कारण विषय की बाहरी चेष्टाएं जैसे शेर का दहाड़ना शेर का भयंकर हाव-भाव जैसे खुला हुआ मुंह, बड़े-बड़े जबड़े और झपट्टा मारते हुए पंजे आदि यह दोनों करण उद्दीपन विभाव है।
अनुभाव आश्रय के बाहरी भाव भंगिमाओं अनुभव कहते हैं जैसे शेर से डर कर व्यक्ति का चिल्लाना, कांपना हाथ पांव फूलना अथवा वहां से भागने का प्रयास करना, पसीना पसीना हो जाना आदि भाव भंगिमाएं अनुभाव कहलाती हैं।
संचारी भाव आश्रय के मन में उत्पन्न होने वाले अस्थाई मनोविकारों को संचारी भाव कहते हैं। उदाहरण के लिए भयानक रस के प्रसंग में शेर से भयभीत होकर व्यक्ति अथवा आश्रय के मन में उत्पन्न चिंता,मोह, जड़ता, उन्माद आदि भाव उत्पन्न होंगे इन्हीं को हम संचारी भाव कहते हैं।
वैसे तो संचारी भाव का गणना करना बहुत मुश्किल कार्य है लेकिन फिर भी काव्यशास्त्र के विद्वानों ने इसकी संख्या 33 मानी है कुछ प्रमुख संचारी भाव के नाम निम्न निश्चित है निम्नलिखित है निर्वेद, गिलानी, उन्माद, उग्रता, मोह, दीनता, चिंता, आलस, शंका आदि।
स्थाई भाव और संचारी भाव में मूलभूत अंतर यह है कि स्थाई भाव उत्पन्न होकर नष्ट नहीं होते अंत तक बने रहते हैं। किंतु संचारी भाव पानी के बुलबुलों के समान है जो बनते और मिटाते रहते हैं।
दूसरा मूलभूत अंतर यह है कि स्थाई भाव तो प्रत्येक रस का नियत होता है। किंतु एक ही संचारी भाव अनेक रसों के साथ रह सकता है। यही कारण है कि संचारी भाव का दूसरा नाम व्यभिचारी भाव है।
इसके अगले भाग में हम सभी रसों को पढ़ेंगे जैसे श्रंगार रस करुण रस आदि
प्रेमचंद जी के प्रमुख उपन्यास…https://www.bhojkhabar.com/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%9a%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96-%e0%a4%89%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%af/
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