रचनात्मक लेखन में लिखित रूप के महत्व को हम इस रुप में समझ सकते हैं कि जब हम इतिहास का विभाजन करते हैं तो लिखित साक्ष्यों की प्राप्ति के आधार
रचनात्मक लेखन में लिखित रूप के महत्व को हम इस रुप में समझ सकते हैं कि जब हम इतिहास का विभाजन करते हैं तो लिखित साक्ष्यों की प्राप्ति के आधार
जब आपको अपने मन की बात, भाव, विचार, आदि किसी दूसरे व्यक्ति से साझा करना हो तो आप किसी ने किसी भाषा का सहारा लेते हैं। हम जिस भाषा में
वैसे तो कक्षा में शिक्षक अमूमन अरस्तु का नाम हमारे सामने लेते रहते हैं जब कोई विद्यार्थी दार्शनिक तरह की बात करें तो जिससे हमें आभास लग जाता है कि
टिप्पण का नाम अक्सर हम सरकारी कार्यालयों के कामकाज में सुनते रहते हैं। जिसको इंग्लिश में नोट बोलते हैं। आज हम इसी विषय को जानेंगे और पढ़ेंगे कि टिप्पणी क्या
कहानी कहने और सुनने की परम्परा भारतवर्ष में बहुत पहले से है। भारतीय कहानी का एक रूप कादम्बरी में मिलता है और दूसरा विष्णु शर्मा द्वारा रचित पंचतन्त्र में। पंचतन्त्र
हिंदी कथा-साहित्य में आंचलिक चेतना को कलात्मक गरिमा और साहित्यिक प्रतिष्ठा प्रदान करने वाले रचनाकारों में फणीश्वरनाथ रेणु का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट है। रेणु ने हिंदी कहानी को
यदि हम ‘कहानी’ के अर्थ की बात करें तो ‘कहानी’ शब्द पाश्चात्य अंग्रेजी के ‘शॉर्ट स्टोरी’ का समानार्थी है। जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘कहना’। वही संस्कृत में ‘कथ’ धातु
कोसी का घटवार कहानी शेखर जोशी द्वारा लिखी गई है। यह कहानी 1958 में प्रकाशित हुई। कोसी का घटवार पूर्वदिप्ति शैली में लिखी गई एक आंचलिक कहानी है। कहानी में
परिंदे, निर्मल वर्मा द्वारा रचित एक प्रसिद्ध यद्यपि आरम्भिक कहानी है। यह कहानी पूर्व दीप्ति शैली (फ्लैशबैक शैली), प्रतीकात्मक शैली तथा मनोविश्लेषणात्मक शैली के गुंफन से अपना आकार ग्रहण करता
‘धरती धन न अपना’ उपन्यास ‘जगदीश चन्द्र’ द्वारा रचित उपन्यास है। यह उपन्यास पंजाब के होशियारपुर जिले के दोआब क्षेत्र के दलित समाज पर केंद्रित है। इसका प्रकाशन सन् 1972