
हरिशंकर परसाई(1924 – 1995) हिंदी व्यंग्य साहित्य के प्रमुख स्तंभ हैं, जिन्होंने मध्यवर्गीय समाज की विसंगतियों को व्यंग्य के माध्यम से उजागर किया। उनकी रचना ‘वह जो आदमी है न’ निंदा की संस्कृति को ‘स्वास्थ्यवर्धक’ बताते हुए शुरू होती है और धीरे-धीरे समाज के दोहरे चरित्र, स्वार्थ तथा पाखंड को बेनकाब करती है। इस शोध पत्र में सिग्मंड फ्रायड के मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत, विशेषकर अचेतन मन, इड – ईगो – सुपर ईगो मॉडल तथा अहं का विभाजन ( ego splitting ) की अवधारणा को लागू करके निबंध का विश्लेषण किया गया है।
निबंध में निंदा से मिलने वाला छिपा आनंद, इड की प्राचीन इच्छाओं (primitive impulses) की अभिव्यक्ति है, जबकि इसे ‘स्वास्थ्यवर्धक’ बताना तार्कीकरण रक्षा तंत्र है। परसाई की विडंबना समाज के अचेतन स्वार्थ, ईर्ष्या तथा schadenfreude (दूसरे की बुराई में खुशी) को उजागर करती है। फ्रायड की 1938 की अपूर्ण रचना ‘Splitting of the Ego in the Process of Defence’ में वर्णित अहं का विभाजन की प्रक्रिया यहाँ मध्यवर्गीय व्यक्ति के दोहरे व्यवहार में दिखती है – चेतन स्तर पर नैतिकता का प्रदर्शन और अचेतन स्तर पर निंदा का आनंद।
यह अध्ययन दर्शाता है कि परसाई का व्यंग्य मात्र सामाजिक आलोचना नहीं, बल्कि मानव मन की गहराई में छिपे दमित इच्छाओं को उघाड़ने का माध्यम है। आज के सोशल मीडिया युग में ट्रोलिंग और कैंसिल कल्चर इसी अचेतन अतिक्रमण की अभिव्यक्ति है। शोध से पता चलता है कि परसाई के व्यंग्य में अचेतन मन की समझ बेहतर समाज निर्माण में सहायक हो सकती है।
कुंजी शब्द: हरिशंकर परसाई, वह जो आदमी है न, अचेतन मन, मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन, व्यंग्य साहित्य, फ्रायडियन थ्योरी, अहं के विभाजन, रक्षा तंत्र, सामाजिक पाखंड।
व्यंग्य साहित्य मात्र हास्य का माध्यम नहीं है। यह मानव मन की गहराई में छिपे अंधकार को उजागर करने का तीखा हथियार है। सिग्मंड फ्रायड ने अचेतन मन को बर्फीली चट्टान (iceberg) की संज्ञा दी – जिसमें चेतन मन केवल ऊपरी 10% हिस्सा है और 90% अचेतन है, जो दमित इच्छाओं, स्वाभाविक प्रवृति, तथा टकराव से भरा होता है। हरिशंकर परसाई ने स्वतंत्र भारत के मध्यवर्गीय समाज की विसंगतियों पर व्यंग्य लिखकर इस अचेतन को साहित्यिक रूप दिया। उनकी रचना ‘वह जो आदमी है न’ निंदा की संस्कृति को ‘विटामिन और प्रोटीन’ बताते हुए शुरू होती है और अंत में समाज के दोहरे चरित्र को बेनकाब करती है।
निबंध का मुख्य कथ्य यह है कि लोग निंदा को स्वास्थ्यवर्धक मानते हैं, लेकिन असल में इसमें स्वार्थ, ईर्ष्या और बदनामी का छिपा आनंद निहित है। संत परनिंदा नहीं करते, इसलिए स्वनिंदा करते हैं; आम आदमी दूसरों की निंदा में आनंद लेता है। परसाई लिखते हैं: “निंदा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं। निंदा खून साफ करती है…” यह अतिशयोक्ति व्यंग्य की शुरुआत है, जो धीरे-धीरे विसंगति उजागर करती है।
शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य हैं:
निबंध में अचेतन इच्छाओं (निंदा से मिलने वाला आनंद ) का पता लगाना।
अचेतन प्रक्रिया जैसे- तार्कीकरण, प्रक्षेपण तथा अहं के विभाजन का विश्लेषण।
व्यंग्यात्मक भाषा और विडंबना कैसे दमित विचारों को चेतन स्तर पर लाती है।
समकालीन प्रासंगिकता– सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और गपशप अचेतन अतिक्रमण की अभिव्यक्ति है।
मुख्य दावा: परसाई की रचना ‘वह जो आदमी है न’ व्यंग्य के माध्यम से मध्यवर्गीय भारतीय समाज के अचेतन मन को उजागर करती है, जहाँ निंदा का छिपा आनंद इड की प्राचीन इच्छाओं तथा अहं का विभाजन की अभिव्यक्ति है, जो चेतन नैतिकता और अचेतन स्वार्थ के बीच निरंतर संघर्ष दर्शाता है।
यह अध्ययन फ्रायड की ‘Splitting of the Ego in the Process of Defence’ (1938) से प्रेरित है, जिसमें बच्चा सहज प्रवृत्तिजन्य मांग और वास्तविक खतरे के बीच दोनों को स्वीकार करके ईगो को विभाजित कर लेता है। परसाई के निबंध में भी व्यक्ति निंदा की वर्जना (सुपर ईगो) और निंदा के आनंद (इड) दोनों को एक साथ बनाए रखता है, जिससे ईगो में दरार पैदा होती है। शोध की महत्ता यह है कि हिंदी व्यंग्य में मनोवैज्ञानिक आयाम अपेक्षाकृत कम अध्ययन हुए हैं। यह पत्र मूल पाठ विश्लेषण, सैद्धांतिक आधार और समकालीन संदर्भ पर आधारित है।
फ्रायड के अनुसार अचेतन मन दमित इच्छाओं, स्वाभाविक प्रवृति और शारीरिक/मानसिक आघातों का भंडार है। इड सुख के विद्यांत पर (तत्काल सुख), ईगो यथार्थ सिद्धांत पर (व्यवहारिक समायोजन) और सुपर ईगो नैतिक आदर्शों का प्रतिनिधि है। जब स्वाभाविक प्रवृति और यथार्थ में संघर्ष होता है, तो ईगो रक्षा तंत्रों को अपनाता है – तार्कीकरण, प्रक्षेपण, पैराप्रेक्सेज़ आदि।
फ्रायड की ‘Splitting of the Ego in the Process of Defence’ में एक बच्चे का उदाहरण दिया गया है: नपुंसकता के भय से डरकर बच्चा यथार्थ को अस्वीकार करता है लेकिन खतरे को भी पहचानता है (भय के लक्षण विकसित करके)। इससे ईगो में स्थाई विभाजन हो जाता है – दोनों विरोधाभासी प्रक्रियाएं साथ-साथ बनी रहती हैं। यह विभाजित मानसिक विकारों, फ़ेटिशिज़्म और सामान्य रक्षा तंत्रों में भी होता है।
परसाई के निबंध में यह विभाजित मानसिक विकार मध्यवर्गीय व्यक्तियों में दिखता है। चेतन स्तर पर “भले आदमी” की छवि ( सुपर ईगो ), लेकिन अचेतन में निंदा का आनंद (इड)। निंदा को “स्वास्थ्यवर्धक” बताना तार्कीकरण है – वर्जित आनंद को सामाजिक तौर पर मान्य ठहराना।
निबंध की शुरुआत ही अचेतन को उजागर करती है: “निंदा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं।” यह अतिशयोक्ति id की primitive impulse को चेतन रूप देती है। संत परनिंदा नहीं करते, इसलिए स्वनिंदा करते हैं – यह प्रतिक्रिया निर्माण है (निषिद्ध को उल्टा करके अपनाना)। आम आदमी स्त्री या शराब संबंधी निंदा में प्रोटीन-विटामिन ढूंढता है, जो schadenfreude का दमित रूप है।
जब कथावाचक निंदा करने वाले से कहता है “पीने दो”, तो वह ईगो का तार्किक भाग दिखाता है। लेकिन निंदा करने वाले का उत्साह टूटना दर्शाता है कि निंदा उनका अचेतन आनंद का स्त्रोत है। कथावाचक निजी प्रश्न पूछकर (खाना, सोना, संभोग) निंदा का पाखंड उजागर करता है – दूसरों की निजी जीवन में घुसना अचेतन अतिक्रमण है।
“वह जो आदमी है न…” वाली विडंबना अहं के विभाजन को स्पष्ट करती है। लोग किसी को “भला आदमी” कहते हुए उसकी निंदा करते हैं। यह दो विरोधाभासी प्रतिक्रियाएं हैं: चेतन प्रशंसा (सुपर ईगो) और अचेतन निंदा (इड)। फ्रायड के अनुसार ऐसा संघर्ष ईगो को विभाजित कर देता है, जो कभी ठीक नहीं होता।
भाषा शैली भी अचेतन को उघाड़ती है – सरल, बोलचाल की, चुटीली। विडंबना और अतिरंजना दमित विचारों को चेतन बनाती है। उदाहरण: शराब पीने वाले की “चेतना का विस्तार” – यह प्राचीन आनंद है। राजनीतिक व्यंग्य (1947 का शक्ति के स्थानांतरण को खाने का स्थानांतरण कहना) संग्रहित अचेत पाखंड को दिखाता है।
मध्यवर्गीय संदर्भ में यह विभाजन स्पष्ट है: स्वतंत्र भारत में आदर्श (समता, ईमानदारी) की बातें, लेकिन असल में स्वार्थ, कालाबाजारी और निंदा। परसाई का व्यंग्य पाठक को आईना दिखाता है, ताकि वह अपने अचेतन को पहचान सके।
निष्कर्ष
‘वह जो आदमी है न’ परसाई का उत्कृष्ट व्यंग्य है जो फ्रायडियन चश्मे से देखने पर अचेतन मन की गहराई प्रकट करता है। निंदा का छिपा आनंद इड की अभिव्यक्ति है, तार्कीकरण रक्षा तंत्र है, और दोहरा व्यवहार विभाजित ईगो का परिणाम। परसाई मात्र समाज की आलोचना नहीं करते, वे मानव स्वभाव की कमजोरियों पर प्रहार करते हुए बेहतर चेतना की कामना करते हैं।
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, गपशप और कैंसिल कल्चर इसी अचेतन अतिक्रमण की अभिव्यक्ति है। फ्रायड के सिद्धांतों की सीमाओं के बावजूद यह विश्लेषण साहित्य को मनोविज्ञान से जोड़कर नई दृष्टि प्रदान करता है।
संदर्भ सूची:
1) परसाई, हरिशंकर। वह जो आदमी है ना। हिंदी समय / गद्य कोश
2) Freud, Sigmund. Splitting of the Ego in the Process of Defence.(सार)
3) कुमार, रोहित। हरिशंकर परसाई के निबंध संग्रह ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ में चित्रित व्यंग्यात्मक संवेदना और भाषिक विश्लेषण। हैदराबाद विश्वविद्यालय, 2022।
4) दीपमाला। शोध प्रविधि।
5) गार्डर, जॉस्टिन। सोफी का संसार। राजकमल प्रकाशन। 2023।
~दिशा, बीए.आनर्स (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय
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