
अगर मैं आपसे पूछूं की भाषा क्या है? तो लगभग आप सभी का उत्तर यही होगा की भाषा एक माध्यम है जिसके द्वारा हम एक दूसरे से बातचीत करते हैं। अगर हम भारत की बात करें तो अधिकतर लोग हिंदी और अंग्रेजी भाषा से वाकिफ होंगे। यदि हम अपनी कक्षाओं में कोई पुस्तक पढ़ते हैं या अध्यापक हमें पुस्तक कोई पढ़ाते हैं तो वह पुस्तक किसी ने किसी भाषा में लिखी होगी। अगर हम हिंदी साहित्य की बात करें तो संपूर्ण हिंदी साहित्य जिस भाषा में रचा गया है या लिखा गया है वह भाषा हिंदी है।
अगर हम भाषा की रचना की बात करें तो वाक्य की रचना से भाषा बनती है। कई सारे शब्दों से मिलकर वाक्य बनते हैं। तो हम कह सकते हैं कि शब्द भाषा में इस्तेमाल होने वाली सबसे छोटी सार्थक और अर्थ पूर्ण इकाई है। अगर हम इसको उदाहरण के रूप में समझने का प्रयास करें तो गुलाब, कॉपी, भाई, बहन यह सभी शब्द हैं।
इनमें से प्रत्येक शब्द किसी वस्तु या किसी व्यक्ति को बताता है। लाल पीला मोटा पतला यह सभी भी शब्द हैं लेकिन यह शब्द किसी न किसी गुण को बताते हैं। इस प्रकार भगाना, करना, दौड़ना, रोना यह सभी भी शब्द है परंतु यह शब्द किसी वस्तु अथवा व्यक्ति को नहीं बल्कि किसी क्रियाकलाप को बताते हैं। राधा, सीता, राम, कृष्ण रहीम यह सभी भी शब्द है लेकिन यह शब्द किसी व्यक्ति विशेष को बताते हैं।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रत्येक भाषा में शब्द के चार प्रकार होते हैं। कुछ व्यक्तिवाचक, कुछ गुणवाचक, कुछ जातिवाचक, और कुछ क्रियावाचक शब्द होते हैं। प्रत्येक शब्द का कोई न कोई अर्थ होता है बिना अर्थ के कोई शब्द नहीं हो सकता। अगर कोई शब्द बिना अर्थ के है तो उसे हम कभी शब्द नहीं कहेंगे। जब कोई शब्द अपना अर्थ बताता है इसका मतलब यह है कि वह अपनी क्षमता को बता रहा है इसी क्षमता को साहित्य शास्त्र में शक्ति कहा गया है। शब्दशक्ति की परिभाषा हम यह दे सकते हैं कि शब्द की वह प्रक्रिया जिसके माध्यम से शब्द से किसी भी अर्थ का बोध होता है शब्द शक्ति कहलाता है।
उपर्युक्त व्याख्या में हम पढ़ चुके हैं कि प्रत्येक शब्द का अपना अलग एक भिन्न अर्थ होता है। या कहें तो अपना एक अर्थ बताने की क्षमता होता है। परंतु इन शब्दों को सुनकर पढ़कर हमें अलग-अलग अर्थों का ज्ञान कई माध्यमों से होता है। इन माध्यमों को देखते हुए शब्दशक्ति के तीन भेद कर हैं अभिधा लक्षणा तथा व्यंजना।
अभिधा शब्दशक्ति-
अभिधाशक्ति को उद्भट महोदय ने बहुत ही स्पष्ट परिभाषित करते हुए कहते हैं कि
“शब्दामभिधानं अभिधाव्यापारो मुख्यो गुणवृतिश्च” -उद्भट
शब्दों का प्रत्यक्ष( सीधा ) अर्थबोध ही अभिधा व्यापार है जिसके मुख्य तथा गौण दो अर्थ होते हैं।
कहने का मतलब बस इतना है कि जिस शब्द का उच्चारण हम करते हैं उस शब्द का जो अर्थ बोध होता है वह उस शब्द का मुख्य अथवा वाच्य अर्थ है। अर्थ वाच्य है तथा शब्द वाचक है। मुख्य अर्थ तथा उसके वाचक शब्द में वाच्य वाचक संबंध होता है। और जिस वृत्ति के कारण शब्द के मुख्य अर्थ का ज्ञान होता है जिसे अभिधा शब्द शक्ति कहते हैं।
लक्षणा शब्दशक्ति –
जब उच्चारण में वाच्य अर्थ या अभिधेय अर्थ क्रियान्वित न हो तो लक्षणा से अलग अर्थ लिया जाता है। लक्षणा के लिए मुख्यतः तीन नियम हैं
(1) इसमें मुख्य अर्थ या अभिधेय अर्थ क्रियान्वित नहीं होता है वह बाधित हो जाता है।
(2) जब मुख्य अर्थ बाधित हो जाता है तो उसके जगह पर दूसरा अर्थ लिया जाता है, लेकिन यह दूसरा अर्थ अनिवार्य रूप से मुख्य अर्थ से संबंधित होता है।
(3) मुख्य अर्थ को छोड़कर या उसके जगह पर दूसरे अर्थ को लेने के पीछे या तो कोई रूढ़ि होती है अथवा कोई उद्देश्य।
लक्षणा का प्रयोग हम प्रत्येक दिन बोलचाल में भी करते हैं। जब किसी राजनीतिक व्यक्ति को प्रशंसा में कहा जाता है कि ‘आप तो एकदम चाणक्य हैं- तो वह व्यक्ति चाणक्य नहीं है, अतः वाच्य अर्थ यहाँ लागू नहीं होता। तब सुनने वाला ‘आप चाणक्य के समान राजनीतिक हैं’- यह संबंधित अर्थ ले लेता है। इस प्रकार इस वाक्य में संबोधित व्यक्ति की पूरी तरह राजनीतिक बताने के लिए लक्षणा की गई है।
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