
युद्ध हमेशा नुकसान का सौदा रहा है। भले ही कोई देश जीत जाए संख्या पक्ष में। या फिर बोले हमने उसको घुटने टेकने पर मंजूर कर दिया। लेकिन कहीं ना कहीं उस देश का भी नुकसान होता है। प्रत्येक युद्ध कोई ना कोई नुकसान लेकर आता है। जिसमें जान माल की हानि होती है। हाल ही में ईरान-अमेरिका-इजरायल जंग में अलग-अलग पक्ष अपनी जीत का ढोल पीट रहे हैं। ईरान कह रहा है कि मैंने अमेरिका और इजरायल को घुटने पर ला दिया। ट्रंप महोदय अलग माहौल बना रहे हैं। दिन-प्रतिदिन अपने ट्वीट से कोई न कोई नया युद्ध छेड़ देते हैं। इन तमाम बिंदुओं को देखते हुए हालिया जो युद्ध विराम हुआ है। उसमें किसकी जीत हुई है। इसका तटस्थ आकलन करना बहुत ही मुश्किल काम है। लेकिन हम ने इस लेख के माध्यम से उन तमाम बिंदुओं को आपके समक्ष रखने का प्रयास करेंगे। जिससे आप यह समझ सके की युद्ध आखिर किसके पक्ष में रहा।
जीवन भर दूसरे के धन पर निर्भर रहने वाला देश ने आज बहुत बड़ा ऐलान किया कि हमने अमेरिका-ईरान-इजरायल जंग में मध्यस्थता की भूमिका निभाई और यह नायाब काम किया है। पाकिस्तान जो जंग के मैदान में कभी कामयाब नहीं रहा लेकिन दलाली के काम में अक्सर कामयाब हो जाता है। किस देश से कितना खैरात लेना है? क्या बोल कर लेना है? कैसी चापलूसी करके लेना है? यह तमाम कला उसको बहुत अच्छे से आता है और इसका ढोल भी वह पीट रहा है कि हमने ईरान-इजरायल-अमेरिका जंग में मध्यस्थता निभाई है। भाई तुमने बहुत अच्छा काम किया मध्यस्थता निभाकर लेकिन कुछ साल पहले इसी ईरान ने पाकिस्तान पर मिसाइलें दागी थी। लेकिन क्या किया जाए? युद्ध है दुश्मन को भी दोस्त बनाना पड़ता है कभी-कभी। भारत का विपक्ष यह आरोप लगा रहा है कि टूटपुँजिया सा देश मध्यस्थता करा रहा है। और भारत इस युद्ध में कोई भूमिका नहीं निभा पाया।
सर्वप्रथम हम शुरुआत मध्यस्थता की बात से ही करते हैं। पिछले 40-50 वर्षों से भारत ने विश्व के किसी भी युद्ध में मिडिलमैन की भूमिका नहीं निभाई है। दलाल की भूमिका भारत ने कभी विदेश के युद्ध में नहीं निभाई है। इस पर हमारे देश के विदेश मंत्री एस जयशंकर प्रसाद ने भी कहा कि भारत कभी भी युद्ध की स्थिति में दलाल की भूमिका नहीं निभाता है। और यह हमारी भारत की विदेश नीति रही है। जिन देशों के बीच में युद्ध है वह आपस में बातचीत करके अपने मसले को सुलझाएं। युद्ध उसका कोई हल नहीं है। इस विषय पर भारत के प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि आज का दौर युद्ध का नहीं बल्कि बुद्ध का दौर है। मतलब हमें अतिवादी नहीं बनना है। हमें मध्यम मार्ग को अपनाना है। जिसमें सभी का भला हो। अब नहीं प्रश्न उठता है कि भारत क्यों किसी भी युद्ध में मिडिलमैन की भूमिका नहीं निभाता? तो इसका सीधा सा उत्तर है कि जम्मू कश्मीर और पीओके भारत का अभिन्न अंग है लेकिन पाकिस्तान ने पीओके को कब्जा कर रखा है। और बार-बार जम्मू कश्मीर को अपना हिस्सा बताता है। यदि हम किसी देश के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप करेंगे तो वह भी हमारे आंतरिक मामले में हस्तक्षेप करने का प्रयास करेगा। भारत की शुरू से विदेश नीति रही है कि वह जम्मू कश्मीर के विषय पर किसी भी तीसरे देश का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेगा। इसलिए भारत कभी भी दलाल की भूमिका में नहीं रहा है।
यदि हम से कोई प्रश्न करें कि यह युद्ध कौन जीता? तो मेरा सीधा सा उत्तर होगा कि इस युद्ध में पूर्ण जीत किसी भी देश का नहीं हुआ। पर आंशिक रूप से इस युद्ध को इसराइल जीत गया। इस विषय को हम दो-तीन बिंदुओं को माध्यम से स्पष्ट करने का प्रयास करेंगे।
पहला बिंदु है कि इजरायल का सबसे पहला टारगेट ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामनेई थे। बरसों से इजरायल उनको मारने का प्रयास कर रहा था। इस युद्ध में इजरायल ने उनकी हत्या कर दी साथ ही साथ ईरान के 40 टॉप लीडरशिप को भी खत्म कर दिया। हम लाख कहें कि ईरान इस युद्ध में झुका नहीं लेकिन देश के सबसे बड़े सुप्रीम लीडर मारा जाना भी एक तरह का हार होता है। साथ ही साथ खामनेई शिया समुदाय के सबसे बड़े धर्मगुरु भी थे। ईरान के तीन बड़े शक्तिशाली नेतृत्व को इसराइल ने कुछ वर्षों में हमला कर जान से मार दिया है। पहले हैं कुडस गार्ड के प्रमुख कासिम सुलेमानी, इब्राहिम रईसी और सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामनेई।
इजरायल की जीत का जो दूसरा सबसे बड़ा बिंदु है इस युद्ध में इजरायल को बहुत बड़ा नुकसान नहीं हुआ। चाहे वह जान की हो चाहे वह भौतिक रूप से। इजरायल के किसी बड़े शहर को ईरानी मिसाइल हिट नहीं कर पाई। अधिकतर फाइटर जेट अमेरिका के ईरान ने मार गिराए लेकिन इसराइल के कोई भी बड़ा लड़ाकू जहाज इस युद्ध में नहीं गिरा न ही उनके सैनिक मारे गए। और सबसे बड़ी बात इजरायल की अधिकतर शहर इस युद्ध से अछूते रहे। वही ईरान के लगभग सभी बड़े शहरों पर इसराइल ने मिस्राइल अटैक की और उस शहर को खंडहर बना दिया तो भौतिक और आर्थिक रूप से भी यह युद्ध इसराइल जीत गया।
हम लाख कहें कि ईरान के पास यूरेनियम के भंडार हैं हम भी मानते हैं कि ईरान के पास यूरेनियम के भंडार हैं। और वह पूर्णतः नष्ट नहीं हुए हैं लेकिन वैज्ञानिक अनुसंधान के भी कुछ नियम और प्रावधान होते हैं। तो एक अनुसंधान को करने में हमें कुछ वर्ष लगते हैं। तो हम पूर्णता निश्चित रूप से तो नहीं कह सकते लेकिन इतना जरूर कह सकते हैं कि आने वाले 5 साल तक के लिए इजरायल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगा दिया। हमारा ऐसा अनुमान है कि अब जो आने वाले 5 साल होंगे इस दौरान तो मुश्किल है कि ईरान अपना परमाणु संयंत्र बना पाए।
तीसरा बिंदु आर्थिक स्तर पर है। इसराइल के पास बड़ी-बड़ी कंपनियां और बहुत अच्छी-अच्छी तकनीक उपलब्ध है। इन सब के माध्यम से वह विश्व स्तर पर बहुत अधिक कमाई करता है। अलग-अलग सॉफ्टवेयर, अलग-अलग ड्रोन तकनीक, अलग-अलग मिसाइल तकनीक, अलग-अलग सोलर टेक्निक और आज जिस स्तर पर AI के माध्यम से युद्ध लड़ा जा रहा है। उस AI तकनीक पर इजरायल का एकाअधिकार है। लेकिन वहीं ईरान की बात करें तो ईरान पर पिछले कई सालों से अमेरिका ने भयंकर प्रतिबंध लगा रखे हैं। जिससे कोई भी देश ईरान से व्यापार नहीं कर रहा है। जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह टूट चुकी है। लेकिन इस युद्ध ने ईरान की अर्थव्यवस्था को 30 साल और पीछे धकेल दिया है। क्योंकि यह युद्ध ईरान की भूमि पर लड़ा गया। भले ही अमेरिकी और इजरायल के सैनिक ईरान से जमीनी संघर्ष न किए हो लेकिन अपने मिसाइल और फाइटर जेट के माध्यम से ईरान की आधारभूत संरचनाओं को नष्ट कर दिया। बड़े-बड़े पुलों, बड़े-बड़े अस्पतालों, बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों और बड़े-बड़े शहरों को इसराइल ने खंडहर बना दिया है। अब उस आधारभूत संरचना को खड़े होने में फिर से 20 से 25 साल लग जाएंगे।
लेबनान ईरान का सहयोगी देश है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू कह रहे हैं कि हम इस सीजफायर पर सहमत हो गए हैं लेकिन इस सीजफायर में लेबनान शामिल नहीं होगा। अर्थात हम लेबनान पर मिसाइल हमले करते रहेंगे। तो हम कैसे मान लेंगे यह सीजफायर हुआ है? और लेबनान ने हर बुरे वक्त में ईरान का साथ दिया है। इसलिए ईरान को यह भी शर्त रखना चाहिए कि इजरायल अपने किसी भी पड़ोसी देश पर हमला नहीं करेगा। सीजफायर में इस बात को ईरानी अधिकारी बहुत प्रमुखता के साथ नहीं रख पाए और यह सीजफायर ना होकर एक आंशिक सीजफायर है। जिसमें इजरायल की जीत है।
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