
नाट्य, और रंगमंच दुनिया की सबसे पुरानी कलाओं में से एक है। जब से इंसान ने अपने मन की बात दूसरों को दिखाने की कोशिश की तभी से नाटक का जन्म हुआ। भारत में इस विषय पर सबसे पहला और सबसे बड़ा ग्रंथ है- भरत मुनि का नाट्यशास्त्र । राधावल्लम, त्रिपाठी ने ‘संक्षिप्त नाट्यशास्त्रम्’ में इसे इस तरह समझाया है कि नाट्यशास्त्र केवले नाटक की किताब नहीं है, यह नाट्यवेद है, यानी ज्ञान का पाँचवाँ वेद।
नाट्यशास्त्र का पहला अध्याय ‘नाट्योत्पत्ति’ है। इसमें भरत मुनि बताते हैं कि त्रेतायुग में जब लोग कामुक और पापी हो गए, तब देवताओं ने ब्रह्मा से प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि हमें ऐसी चीज़ चाहिए जो देखने और सुनने में मनोरंजक हो और जिसे चारों वर्णों के लोग समझ सकें। इस पर ब्रह्मा ने चारों वेदों का सार लेकर नाट्यवेद बनाया। ऋग्वेद से पाठ्य (संवाद), सामवेद से गीत, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रस लेकर ब्रह्मा ने पंचम वैद, नाट्यवेद की रचना की। इसे पंचमवेद कहा गया, क्योंकि यह नाट्य की उत्पत्ति के बारे में भारत की सबसे प्रमुख धारणा है।
नाट्यशास्त्र के व्याख्याकार अभिनव गुप्त के अनुसार नाट्यवेद की परंपरा इस तरह चली की पहले सदाशिव ने ब्रह्मा को नाट्य की शिक्षा दी, ब्रह्मा ने भरत मुनि को और भरत मुनि ने अपने सौ पुत्रों को सिखाकर इसे दुनिया में फैलाया। इसीलिए राधावल्लभ त्रिपाठी ने लिखा है कि नाट्यशास्त्र में शिव, ब्रह्मा और भरत, तीनों ही प्रमुख आचार्य माने गए हैं।
रस और लोककल्याण भरत मुनि ने नाट्य का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन को नहीं माना है। उनका प्रसिद्ध वाक्य है –
‘नाट्यं भिन्नरुचेर्जनस्य बहुधाप्येकं समाराधनम्’
यानी नाटक वह माध्यम है जो जो अलग-अलग स्वभाव और रुचि के लोगों को एक साथ संतुष्ट कर सके। उन्होंने कहा कि नाटक में धर्म है, काम है, अर्थ है, मोक्ष है। दुखियों को सांत्वना मिलती है, थके हुए को आराम मिलता है और अज्ञानी को ज्ञान् मिलता है। इस तरह नाट्य का जन्म ही लोककल्याण के लिए हुआ था।
4. मार्गी और देशी-दो परंपराएँ-
नाट्यशास्त्र में नाट्य को दो भागों में बाँटा गया है- मार्गी और देशी। मार्गी वह है जो शास्त्रीय नियमों पर चले जैसे संस्कृत नाटक। ‘देशी’ वह है जो लोकजीवन से आए, जो क्षेत्रीय हो, जो आम लोगों की भाषा में हो। देवेन्द्र राज अंकुर ने ‘रंगमंच के सिंद्धात’ में बताया है कि यहीं परंपरा आँगे चलकर लोक रंगमंच बनी ।
5. रंगमंच का स्वरुप – रंगस्थल और नाट्यगृह,
एच. वी. शर्मा ने ‘रंग स्थापत्यः कुछ टिप्पणियाँ’ में बताया है कि भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के दूसरे अध्याय में ‘मण्डपविधान यानी मंच की बनावट का विस्तृत विवरण है। तीन प्रकार के गस्थल बताए गए हैं-
इसका मतलब है कि उस जमाने में भी मंच की डिज़ाइन सोच-समझकर बनाई जाती है थी। नाट्यगृह में रंगपीठ (मंच), नेपथ्य (पर्दे के पीछे का कमरा) और प्रेक्षागृह (दर्शकों की जगह) तीनों का अलग-अलग महत्त्व था।
6. ऋग्वेद में नाट्य के बीज-
कृपिला वात्स्यायन ने से अपनी पुस्तक ‘पारम्परिक भारतीय रंगमंच अनंत धाराएँ’ में लिखा है कि- ऋग्वेद के कुछ सूक्त नाटकीय संवाद के रूप में हैं-जैसे यम-यमी संवाद, पुरुवा-उर्वशी संवाद। ये भारत में नाट्य के सबसे पुराने बीजतत्व है। यजुर्वेद में ‘शैलूष’ शब्द मिलता है जिसका मतलब है ‘नट’ है यानी अभिनेता। इससे पता चलता है कि वैदिक काल में भी अभिनेताओं का अस्तित्व था।
7. अरस्तू का अनुकरण सिद्धांत-
पश्चिमी दुनिया के युनानी दार्शनिक अरस्तू ने नाटक की उत्पत्ति को ‘अनुकरण’ से जोड़ा है। उनके अनुसार इंसान की स्वाभाविक इच्छा होती है कि वह दूसरों की नकल करे, इसी से धीरे-धीरे नाटक बना। यूनान में डायोनिसस देवता के उत्सवों में गाए जाने वाले ‘डिथिरैम्ब’ गीतों से त्रासदी का जन्म हुआ। जी. एन. दासगुप्ता ने ‘मंच आलोकन’ में दोनों परंपराओं की तुलना करते हुए बताया है कि चाहे भारत हो या यूनान, नाटक की जड़ें धर्म और उत्सव मे हैं।
8. नाट्योत्पत्ति की आधुनिक दृष्टि-
प्रो. रमेश गौतम ने बताया है कि नाट्य की उत्पत्ति सिर्फ देवताओं की कृपा नहीं थी। यह मानव की ज़रुरत से भी जन्मी। खेत की फसल के लिए देवता को खुश करने करने के लिए नृत्य करना, शिकार से पहले शिकार का नाट्य अभिनय करना, ये सब मिल कर आधुनिक नाटक की नींव बने।
9. रस-नाट्य की आत्मा-
नाट्यशास्त्र में रस को नाट्य की आत्मा कहा गया है। भरत मुनि का रस-सूत्र है- “विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः” अर्थात, विभाव, अनुभाव और संचारीभावों के मेल से रस की उत्पत्ति होती है। मूल रूप से आठ रस थे- श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र रौद्र वीर, भयानक, विभत्स्य और अद्भुत । बाद में अभिनव गुप्त ने शांत रस को नौवाँ, रस माना। देवेन्द्र राज अंकुर के अनुसार नाट्य में इसकी अनुभूति ही वह चीज है जो दर्शकों बाँधे रखती है। यही नाट्य की उत्पत्ति का असली कारण भी है।
10. भारत और यूनान
जी. एन. दासगुप्ता ने ‘मंच आलोकन’ में भारतीय और यूनानी रंगमंच की तुलना करते हुए बताया है कि- दोनों जगह नाट्य की शुरुआत धार्मिक उत्सवों से हुई। भारत में देवासुर संग्राम के अवसर पर पहला नाटक खेला गया, यूनान में ड्रायोनिसस के उत्सव में। लेकिन दोनों में एक बड़ा फर्क है, भारतीय नाट्य में दुखद अंत को उचित नहीं माना गया है जबकि यूनानी त्रासदी में नायक का पतन अनिवार्य था। भरत मुनि ने कहा कि नाटक में सुखांत् होना चाहिए क्योंकि दर्शक दुख से आनंद की तरफ जाने के लिए नाटक देखने आता है।
निष्कर्ष-
इस प्रकार देखें तो नाट्य और रंगमंच की उत्पत्ति में के बारे में एक नहीं, कई धारणएँ हैं। भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार यह ब्रह्मा का दिया हुआ पंचमवेद है। अरस्तू के अनुसार यह मनुष्य की अनुकरण-वृत्ति का परिणाम है। लोक उत्सवों और धार्मिक अनुष्ठानों से भी इसका जन्म हुआ। लेकिन सभी धारणाओं में एकबात समान है-नाट्य मानव जीवन की गहरी जरुरत से पैदा हुआ। जैसा भरत मुनि ने कहा- न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला- अर्थात ऐसा कोई ज्ञान, शिल्प, विद्या या कला नहीं जो नाट्य में न हो।
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