रचनात्मक लेखन के लिखित रूप

रचनात्मक लेखन में लिखित रूप के महत्व को हम इस रुप में समझ सकते हैं कि जब हम इतिहास का विभाजन करते हैं तो लिखित साक्ष्यों की प्राप्ति के आधार पर करते हैं जैसे जिस काल में लिखित साक्ष्य नहीं मिले उसको प्रागैतिहासिक कहते हैं। जिस काल में लिखित साक्ष्य मिले लेकिन पढ़े नहीं गए उसे आद्य इतिहास कहा गया और जिस काल में लिखित साक्ष्य मिले और उसे पढ़ लिया गया उसे इतिहास कहा गया।

लिखित साक्ष्य सदैव प्रमाणिकता का प्रतीक रहा है। प्राचीन काल में हमारे देश में सुश्रुत परंपरा (किसी एक व्यक्ति से बात को सुनकर दूसरे व्यक्ति को बताना) रही है जो बात गुरु महर्षि अपने शिष्यों से बताते थे। फिर वही बात शिष्य जब गुरु बनते हैं तो वह अपने शिष्यों से बताते हैं लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है की जो बात गुरु ने अपने शिष्य को बताइए पूर्ण रूप से वही बात शिष्य भी अपने शिष्य को बताएं। 

तो हम कह सकते हैं कि सुश्रुत परंपरा में जब किसी व्यक्ति ने कोई बात कही हो तो यह बिल्कुल संभव नहीं है कि वह बात दूसरे व्यक्ति तक उसी रूप में जाए। कई व्यक्तियों के माध्यम से वह बात पहुंचते पहुंचते कुछ और रूप में पहुंच सकता है लेकिन जब इस बात को गुरु या महर्षि अपने शिष्य को लिखित रूप में या कहें किसी पुस्तक के रूप में उसे पढ़ने के लिए प्रदान करता है तो उसे वह पूर्ण प्रामाणिक रूप में प्राप्त होगा जब इसी किताब को शिष्य अपने शिष्य को हस्तानांतरित करता है तो उसे भी प्रमाणिक और लिखित ज्ञान प्राप्त होता है। इसलिए हम कह सकते हैं कि लिखित रूप का बहुत महत्व है।

लेकिन हमें इस लेख में रचनात्मक लेखन में लिखित रूप के महत्व को पढ़ाना है। तो हम कुछ व्याख्या और उदाहरण के माध्यम से रचनात्मक लेखन में लिखित रूप के महत्व को समझने का प्रयास करेंगे।

जब से पूरे विश्व में प्रिंटिंग प्रेस आया है तब से करोड़ों-अरबों किताबें लिखी जा चुकी हैं। लेकिन इन करोड़ों अरबों किताबों में से अगर आपसे पूछा जाए कि क्या आपको सारी किताबें पसंद हैं? तो आपका उत्तर संभवत नहीं होगा क्योंकि कुछ ही किताबें होती हैं जो आपके जीवन पर अपना गहरा छाप छोड़ती हैं लेकिन अगर मैं आपसे पूछूं की इन करोड़ और अरबों किताबों में से आपको कुछ ही किताबें क्यों पसंद आए? तो आप उसके कई कारण बता सकते हैं। 

उसको पढ़ने के बाद आप कहेंगे की अपने आप में एक नई रचनात्मकता का प्रयोग करके लिखी हुई किताब हो सकता है। उस लेखक ने उस किताब में किसी नई समस्या का जिक्र किया हो जो अब तक नहीं हुई हो सकती है। लेखक ने बहुत ही कम शब्दों में ही अपनी बात को स्पष्ट कर दिया है। जिसे हम कहते हैं गागर में सागर भरना। लेखक ने व्यंग्य के माध्यम से किसी ज्वलंत विषय को समाज के सामने प्रस्तुत किया है। ऐसे अनगिनत कारण हो सकते हैं उस किताब के प्रसिद्ध होने के।

हो सकता है कि इन किताबों में किसी व्यक्ति को नाटक पसंद हो। किसी को उपन्यास पसंद हो। किसी को कहानी पसंद हो। किसी को एकांकी पसंद हो। किसी को निबंध पसंद हो, यह बस बताने का इतना मकसद है कि सबकी पसंद भिन्न-भिन्न हो सकती है।

सभी लेखक चाहते हैं कि हमारी रचना को समाज विश्व में स्वीकार्यता मिले। इसको बहुत लोग पढ़ते हैं। लेकिन क्या पाठक सभी रचनाओं को पढ़ता है? कुछ ही रचनाओं को प्रसिद्धि मिलती है। जब वह रचना अन्य रचनाओं से कुछ हटकर लिखी गई हो। अर्थात कहे तो उसमें रचनात्मक लेखन का बहुत ही सजक बहुत ही उत्कृष्ट और बहुत ही प्रासंगिक संदर्भों को लेकर लिखा गया हो। पाठक उस रचना से खुद को जोड़ पाए। कि यह रचना मेरे ही बारे में लिखा गया है।

लेखक का यह रचनात्मक लिखित रूप ही उसे विश्व पटेल के रूप में ख्याति और स्वीकार्यता प्रदान करता है। जिससे एक पाठक दूसरे पाठक को यह रचना पढ़ने का सुझाव देता है। जिससे आज के वैश्वीकरण के दौर में पाठक की जीविका भी चलती है। उसको प्रसिद्ध भी मिलती है। अर्थात कहें तो एक पंथ से उसके दो कार्य हो जाते हैं। उसका एक पंथ क्या है? लेखक का रचनात्मक लिखित रूप।

अब हम रचनात्मक लेखन के विभिन्न रूपों की चर्चा निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से करने का प्रयास करेंगे।

किसी भी विचार दर्शन को कहने अथवा लिखने का सबसे सशक्त माध्यम गद्य है। इसके माध्यम से ही हम अपनी दिनचर्या के अधिकांश कार्यों को करते हैं। गद्य लेखन के दो रुप हैं पहला है कथात्मक रूप दूसरा है कथेतर रुप।

रचनात्मक लेखन के लिखित रूप में कहानी का महतव-

कहानी किसी भी घटना को अगर किसी व्यक्ति को बताना है तो उसको कथा के माध्यम से बहुत ही रुचिकर बनाकर बता सकते हैं। कथात्मक विधा के कई रूप हैं जिनमें प्रमुख है उपन्यास कहानी और नाटक आदि नीचे हम उपन्यास कहानी और नाटक तीनों का एक-एक कर हम चर्चा करेंगे।

कहानी के स्वरूप को लेकर हमारा एक लेख इस वेबसाइट पर प्रकाशित है तो आप कहानी के पूरे स्वरूप को इस लिंक को क्लिक करके पढ़ सकते हैं

इस प्रकार उपन्यास के स्वरूप को लेकर हमारा एक लेख इस वेबसाइट पर प्रकाशित है तो आप उपन्यास के पूरे स्वरूप को इस लिंक को क्लिक करके पढ़ सकते हैं

रचनात्मक लेखन के लिखित रूप में नाटक का महतव-

नाटक की परंपरा बहुत ही प्राचीन काल से चलती आ रही है। नाटक अपने उत्पत्ति से ही शब्द की कला के साथ-साथ अभिनय की कला भी है। अक्सर आप लोग सुनते होंगे कि आपको कोई व्यक्ति बोलता है कि आप बहुत ही नाटकीय अंदाज में बात कर रहे हैं। अभिनय कला के संदर्भ में बोलता है कि आजकल तुम बहुत नाटक कर रहे हो। तो नाटक हम बोली के माध्यम से भी प्रस्तुत कर सकते हैं। और उसका अभिनय भी करके प्रस्तुत कर सकते हैं।

लेकिन नाटक को प्रस्तुत करने का सबसे सशक्त माध्यम रंगमंच पर अभिनय करके ही किया जा सकता है। जिसे देखने वाला सारी भाव भंगिमाएं सारे विचार दर्शन और सारी कलाओं को समझ सकता है। रंग मंच पर नाटक के प्रस्तुतीकरण के लिए लेखक के शब्दों के अतिरिक्त निर्देशक अभिनेता मंच व्यवस्थापक और दर्शक आदि की आवश्यकता होती है। इन सभी के सहयोग से हमें एक अच्छे और सफल नाटक का रसस्वादन होता है।

नाटक के संदर्भ में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है- बहुत पहले भारतवर्ष में जो नाटक खेले जाते थे उनमें बातचीत नहीं हुआ करती थी। वे केवल नाना अभिनयों के रूप में अभिनीत होते थे। अब भी संस्कृत के पुराने नाटकों में इस प्रथा का भग्नावशेष प्राप्य है।… यह इस बात का सबूत बताया जाता है कि नाटकों में बातचीत उतनी महत्त्वपूर्ण वस्तु नहीं मानी जाती थी जितनी क्रिया ।… नाटक की पोची में जो कुछ छपा होता है उसकी अपेक्ष वही बात ज्यादा महत्त्वपूर्ण होती है जो छपी नहीं होती और सिर्फ रंगभूमि में देखी जा सकती है। नाटक का सबसे प्रधान अंग उसका क्रिया-प्रधान दृश्यांश ही होता है, और इसीलिए पुराने शास्त्रकार नाटक को दृश्य काव्य कह गए हैं।

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