
भारत में शास्त्रीय नाट्य परंपरा (संस्कृत नाटक) के साथ-साथ एक और परंपरा हमेशा जिंदा रही, वह है लोकधर्मी नाट्य परंपरा। जब संस्कृत नाटक धीरे-धीरे कमज़ोर होने लगा, तब यही लोक रंगमंच था जिससे भारतीय नाट्यकला को जीवित रखा। कृपिला वात्स्यायन ने ‘पारम्परिक भारतीय रंगमंच अनंत धाराएँ’ में इसे बहुत सुंदर तरीके से कहा है-“समकालीन प्रतीत होने वाली कला रूप में विभिन्न कालखण्डों की छाप पहचानी जा सकती है।” यानी लोक रंगमंच की हर शाखा में सदियों की परंपरा छुपी है।
नाट्यधर्मी और लोकधर्मी –
नाट्यशास्त्र में, नाट्य को दो धाराओं में बाँटा गया है। नाट्यधर्मी और लोकधर्मी। नाट्यधर्मी वह है जो शास्त्रीय। नियमों पर आधारित है, जैसे कालिदास के नाटक। लोकधमर्मी वह है, जो सीधे लोकजीवन से आता है, जिसमें साधारण लोगों की भाषा, उनके गीत, उनके नृत्य और उनकी कहानियाँ हैं। महेश आनंद और, देवेन्द्र राज अंकुर ने ‘रंगमंच के सिद्धांत’ में बताया है कि यही लोकधर्मी परंपरा आज के लोक रंगमंच की आत्मा है।
खुला रंगस्थल-
मंच की आज़ादी लोक रंगमंच के लिए कोई कोई बड़ा सभागार नहीं चाहिए। गाँव की चौपाल, मंदिर का आँगन, खेत की खुली ज़मीन, यही इसका रंगस्थल है। एच. वी. शर्मा ने ‘रंग स्थापत्य’ में बताया कि लोक रंगमंच का मंच-स्वरूप नाट्यशास्त्र के ‘चतुरस्त्र’ मंच जैसा होता है- जहाँ दशर्क तीन या चारों तरफ से घेरकर बैठते हैं। इससे अभिनेता और दर्शक के बीच की दूरी मिट जाती। वह मंच पर सबके सामने होता है। ढोलक, हारमोनियम, मजीरा, नगाड़ा ये वाद्ययंत्र अभिनेताओं केसाथ साथ चलते हैं। नौटंकी में गायन इतना जरूरी है कि वह ‘संगम नाटक’ कहलाती है। गीत केवल सजावट नहीं है, वे कहानी को आगे बढ़ाते हैं और दर्शकों की भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं।
पौराणिक कथाएँ
लोक रंगमंच की ज्यादातर कहानियाँ रामायण, महाभारत और पुराणों से आती हैं। रामलीला, रासलीला, कृष्णलीला, ये सब इसी परंपरा के हिस्से है। जी. एन. दासगुप्ता ने ‘मंच आलोकन’ में लिखा है कि लोक नाट्य में दर्शक कहानी पहले से जानते हैं फिर भी बार-बार देखने आते है। यहाँ क्या होगा? से ज्यादा जरूरी है कैसे होगा? यानी अभिनेता का अभिनय, उसका रस, उसकी भावनाएँ?
लोकधर्मी नाट्य
कपिला वात्स्यायन ने ‘पारंपरिक भारतीय रंगमंच’ मे नाट्यधर्मी और लोकधर्मी नाट्य का फर्क समझाया है। नाट्यधर्मी में सब कुछ प्रतीकात्मक होता है, अभिनय शास्त्रीय नियमों पर अधारित होता है। लोकधर्मी में सब कुछ जीवंत और प्राकृतिक होता है। मंच पर असली जैसा माहौल बनाया जाँता जाता है, दर्शकों से सीधा संवाद होता है। संस्कृत नाट्य के पीछे हट जाने के बाद लोकधर्मी परंपरा ने ही भारतीय रंगमंच को जीवित रखा।
रात्रिकालीन प्रदर्शन और सामूहिकता.
भारत के अधिकांश लोक नाट्य रात में खेले जाते हैं कभी-कभी पूरी रात तक। नौटंकी ज़ात्रा, तमाशा, माचा ये सब रात के नाटक है। दिन में के काम, रात को नाटक यही किसान समाज की दिनचर्या थी।
सूत्रधार-
नाट्यशास्त्र में ‘सूत्रधार’ का का जिक्र है- वह पात्र जो नाटक का सूत्र यानी धागा थामे रखता है। है। राधावल्लभ त्रिपाठी ने ‘संक्षिप्त नाट्यशास्त्रम्’ में बताया है कि सूत्रधार ही पूर्वरंग (प्रस्तावना) का संचालन करता है। लोक रंगमंच में यही परंपरा आज भी जीवित है- नौटंकी में रंगीला’ सूत्रधार होता हूँ। यक्षगान में ‘भागवत’, भवाई में ‘नायक’। ये पात्र दर्शकों से सीधे बात करते हैं, कहानी आगे बढ़ाते हैं और माहौल बनाते हैं।
विदूषक-
लोग रंगमंच में विदूषक बहुत ज़रूरी पात्र है। देखने में हास्यास्पद लेकिन असल में वह समाज का आईना होता है। देवेन्द राज अंकुर के अनुसार विदूषक वह बात कह देता है जो सीधे नहीं कही जा सकती, व्यंग्य के माध्यम से वह समाज की बुराइयों पर चोट करता है। तमाशा में ‘सोंगाड्या’, नौटकी में ‘हास्य पात्र, माचा में जोकर’ सब इसी परंपरा की देन है।
अभिनय के चार अंग-
नाट्यशास्त्र में अभिनय के चार भेद बताए गए हैं- आंगिक (शरीर की हरकतें), वाचिक (बोलने का तरीका), आहार्य (वेशभूषा और मेकअप) और सात्त्विक (मन के भाव)। लोक रंगमंच में ये चारों अंग बहुत अतिरंजित होते हैं ताकि दूर बैठा दर्शक भी समझ सके। यक्षगान और कथकली में ‘आहार्य’ अभिनय इतना विस्तृत है कि एक पात्र को तैयार होने में घंटों लग जाते हैं।
संगीत-
प्रो. रमेश गौतम ने ‘हिंदी रंगमंच का लोकपक्ष ‘में बताया है कि लोक रंगमंच में संगीत पर्दे के पीछे नहीं रहता। आनंद के अनुसार इस रात्रिकालीन प्रदर्शन में दीयों और मशालों की रोशनी एक जादूई माहौल बनाती थी । और यह केवल देखने का काम नहीं था, पूरा, गाँव इसमें भाग लेता था, यही इसकी सामुदायिक शक्ति थी।
भारत की प्रमुख लोक नाट्य परंपराएँ-
कपिला वात्स्यायन ने ‘रंगमंच अनंतधाराएँ’ शीर्षक से ही यह बता दिया है कि- भारत की लोक नाट्य परंपराएँ अनगिनत है। उत्तर भारत में नौटंकी और रामलीला (उत्तर प्रदेश), माचा (मध्यप्रदेश), नाचा (छत्तीसगढ़) पश्चिम में तमाशा (महाराष्ट्र), भवाई (गुजरात), पूर्व में जात्रा (बंगाल), माछ (ओडिशा), अंकिया नाट (असम) दक्षिण में यक्षगान (कर्नाटक), तेरुकुत्तु (तमिलनाडू), कूडियाट्टम (केरल) ये सब भारत की अनंत धाराएँ हैं।
लोक रंगमंच और आधुनिक रंगकर्म-
प्रो. रमेश गौतम ने बताया है कि भारत में हबीब तनवीर (चरणदास चोर), बादल सरकार (‘तीसरा रंगमंच) और विजय तेंदुलकर इन आधुनिक रंगकर्मियों ने लोकरंगमंच से सीधे प्रेरणा ली। उन्होंने लोक-नाट्य की शैली, उसके मंच, उसके संगीत और उसके दर्शक-अभिनेता संबंध को नए नाटकों में में उतारा। हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ के ‘नाचा कलाकारों’ के साथ मिलकर ऐसे नाटक बनाए जो लोक भाषा और लोक शैली में थे लेकिन उनका संदेश बहुत गहरा और आधुनिक था। यह साबित करता है कि लोक रंगमंच कोई पुरानी चीज़ नहीं यह आज भी प्रासंगिक है।
लोक रंगमंच में नारी पात्र-
लोक रंगमंच की एक और रोचक प्रवृत्ति है, परंपरागत रूप से नारी पात्रों की भूमिका पुरुष ही निभाते थे।यक्षगान, कथककली, तेरुकुत्तु और पुराने नौटंकी में भी, यही चलन था। देवेन्द्र राज अंकुर ने ‘रंगमंच के सिद्धांत’ में बताया है कि यह परंपरा नाट्यशास्त्र के आहार्य अभिनय की उस धारणा से जुड़ी है जिसमें वेशभूषा और रुप परिवर्तन के जरिए कोई भी पात्र बनाया जा सकता है। आज यह बदल रहा है, लोक नाट्य में अब महिला कलाकार भी सक्रिय भूमिका निभा रही है।
लोक रंगमंच और समाज-
लोक रंगमंच कभी भी समाज से अलग नहीं रहा। यह हमेशा अपने समय की सामाजिक समस्याओं को उठाता रहा है। जी. एन. दासगुप्ता ने मंच आलोकन में लिखा है कि लोक नाटकों में जातिभेद, शोषण, गरीबी और स्त्री-पीड़ा, जैसे विषय बहुत पहले से आते रहते है, भले ही वे पौराणिक कहानियों के आवरण में आए हों यहीं कारण है कि स्वतंत्रता आंदोलन में भी लोक नाट्य का प्रयोग जन-जागरण के लिए किया गया।
निष्कर्ष-
लोक रंगमंच भारतीय संस्कृति की जीवंत धड़कन है। खुला मंच, सूत्रधार की उपस्थिति, संगीत-नृत्य, अभिनय का संयोजन, पौराणिक कथाएँ, दर्शकों की सहभागिता ये सब मिलकर लोक रंगमंच को एक ऐसी कला बनाते हैं जो हर काल में जीवित रही है। कपिला वात्स्यायन की बात को याद करें तो यह अनंतधाराएँ हैं जो शास्त्रीय परंपरा से अलग भी है और उससे जुड़ी भी है। जब तक भारत में गाँव है, तब तक लोगों में अपनी कथाएँ सुनने की चाहत है तब तक लोकमंच जिंदा रहेगा।
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