
शेखर एक जीवनी
प्रथम भाग- उत्थान का प्रकाशन 1941
दितीय भाग- संघर्ष का प्रकाशन 1944
शेखर एक जीवनी एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास जिसके लेखक अज्ञेय हैं। इसके प्रथम भाग का प्रकाशन 1941 ई में हुआ है।
शेखर एक जीवनी प्रथम भाग उत्थान चार खंडों में विभाजित है।
शेखर बचपन से ही तीक्ष्ण बुद्धि और जिज्ञासु बालक था वह हर विषय पर प्रश्न करता और वह उसका उत्तर जानना चाहता था। इस उपन्यास में शेखर के बाल मनोविज्ञान को चित्रित किया गया है। वह बहुत ही प्रश्नशील बालक है। जो अपने प्रश्नों का उत्तर हर किसी से प्राप्त करना चाहता है। साथ ही वह कई प्रश्नों का तर्कशील उत्तर भी देता है। लेकिन जब उसके प्रश्नों का उत्तर तर्कपूर्ण नहीं मिलता तो वह सभी आदर्श पूर्ण मान्यताओं को तोड़ने का प्रयास करता है लेकिन माता-पिता द्वारा उसको डांटने और फटकारने से शेखर एक विद्रोही किस्म का इंसान बन जाता है।
शेखर बचपन से ही स्थापित मान्यताओं पर तर्कपूर्ण प्रश्न करता और उसका उत्तर पाने के लिए व्याकुल रहता लेकिन जब किसी भी व्यक्ति से इसका संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता तो वह खुद ही मनन चिंतन करके उन सभी मान्यताओं को खारिज करने का प्रयास करता। पूरे उपन्यास में इसी चिंता व्याकुलता को लेकर शेखर बड़ा होता है।
यह उपन्यास अस्तित्ववादी अवधारणा के संदर्भ में लिखा गया है। अस्तित्ववादी विचार पूरे उपन्यास में शेखर के प्रश्नों से रेखांकित होता है। इस उपन्यास में अज्ञेय जी लिखते हैं कि किसी बच्चे के जन्म लेते हैं उसे पर कई सारे आदर्शवादी मान्यताओं को थोप दिया जाता है। जिसके सहारे वह बालक बड़ा होता है।
यदि वह बालक जिज्ञासु और प्रश्नशील नहीं है तो वह उन सभी आदर्शवादी मान्यताओं को वैसे ही स्वीकार कर लेगा जैसे उसके माता-पिता देते हैं। लेकिन यदि बालक प्रश्नशील है तो उन सभी मान्यताओं पर प्रश्न खड़ा करेगा जो उसके माता-पिता से प्राप्त होता है। शेखर बचपन से ही प्रश्नशील और एक जिज्ञासु बालक था। वह हर उन आदर्शवादी मान्यताओं पर प्रश्न खड़ा करता जो उसके माता-पिता से प्राप्त होता जब उन मान्यताओं पर खड़े किए गए प्रश्न का उसको तर्कसंगत उत्तर नहीं मिलता तो वह व्याकुल हो उठता और खुद से उसे विषय पर विचार करने लगता।
एक व्यक्ति के अस्तित्व और उसके अस्मिता का वर्णन करते हुए अज्ञेय शेखर के बचपन की घटनाओं को याद करते हुए बताते हैं कि जब शेखर का जन्म हुआ। तब उसके नामकरण को लेकर माता-पिता में काफी तर्क वितर्क हुए कि बच्चा का नाम भगवान बुद्ध के आधार पर रखा जाए ऐसा इसलिए था क्योंकि जिस दिन शेखर का जन्म होता है उस दिन भगवान बुद्ध की अस्थियों का मंजूषा निकल रही थी।
तब बौद्ध भिक्षु शेखर के पिताजी के पास आकर कहते हैं कि इस बच्चे का नाम भगवान बुद्ध के आधार पर रखिए क्योंकि यह बच्चा भगवान बुद्ध का अवतार है। साथ ही साथ इस बच्चे को बौद्ध धर्म की दीक्षा देनी चाहिए। इस बात को लेकर शेखर के पिता सहमत भी हो जाते हैं। और शेखर का नाम बुद्धदेव रखना चाहते थे। जबकि मां शेखर का नाम ताओ रखने वाली थी और वह चाहती थी कि मेरा बेटा बड़ा होकर बैरिस्टर बने जबकि पिता चाहते थे कि मेरा बेटा इंजीनियर बने।
पारंपरिक भारतीय माता-पिता की तरह शेखर के भी माता-पिता ने उस पर बचपन से ही अपनी भविष्य की इच्छाएं थोप दिए। और उसी तरह से उसके परवरिश में लग गए। पर उन्होंने कभी यह जानने का प्रयास नहीं किया कि उनका बच्चा बड़ा होकर क्या बनना चाहता है? और क्या करना चाहता है? यही पर अस्तित्ववाद की अवधारणा चरितार्थ होती है कि जब कोई व्यक्ति अपने स्वभाव और व्यक्तित्व के अनुसार कार्य न करके किसी अन्य के दबाव में आकर कोई कार्य करता है तो वह वहां पर उसका अस्तित्व खत्म हो जाता है यही अस्तित्व की अवधारणा है।
यही कारण है कि माता-पिता के अत्यधिक दबाव और उनकी वर्जनाओं के कारण बालक एक समय के बाद विद्रोही स्वभाव के हो जाते हैं। और शेखर भी एक समय के बाद विद्रोही स्वभाव का बालक बन जाता है।
शेखर का मस्तिष्क बचपन से ही अति संवेदनशील था। वह हर विषय पर एक तार्किक मनन और चिंतन करता था। बहुत ही कम उम्र से शेखर सभी परिस्थितियों को समझता और झेलता गया जिस कारण से उसके मन में बहुत सारी पीड़ाएं उत्पन्न हुई। अंततः एक हंसता खेलता हुआ बच्चा धीरे-धीरे शांत स्वभाव और चिंतनशील होता चला गया और साथ ही उसके स्वभाव में एक विद्रोहीपन की चेतना भी जागृत हो उठी।
शेखर के पिता शेखर के बाल मन को थोड़ा बहुत समझते थे। और उसकी कुछ बातों को मान लेते थे जब शेखर बचपन में स्कूल जाने से मना कर देता है। तो उसके पिताजी उसको कुछ दिन के लिए स्वच्छंद छोड़ देते हैं। लेकिन शेखर देखाता है कि घर में उसके भाई ट्यूशन क्लास पढ़ रहे हैं तो वह भी कमरे के बाहर खड़े होकर शिक्षक की सारी बातों को सुनता था। तब शेखर के पिता को समझ में आता है कि शेखर थोड़ा अलग स्वभाव का बच्चा है।