कहानी : स्वरूप और विशेषताएँ

यदि हम ‘कहानी’ के अर्थ की बात करें तो ‘कहानी’ शब्द पाश्चात्य अंग्रेजी के ‘शॉर्ट स्टोरी’ का समानार्थी है। जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘कहना’। वही संस्कृत में ‘कथ’ धातु से ‘कथा’ शब्द बना है। यहां पर भी इसका अर्थ ‘कहना’ ही होता है। जब व्यक्ति कोई अपने कथ्य को एक पूर्ण भाव के साथ और एक विस्तृत रूपरेखा के साथ कहता है या फिर लिखता है तो वह कथा कहलाती है। सामान्य बोलचाल की भाषा में हम कथा और कहानी को एक ही समझ लेते हैं। पर सत्य यह है कि कहानी कथा साहित्य का एक अंग है।

कहानी भारतीय गद्य विधा का एक अंग है जैसे- गद्य के अंतर्गत उपन्यास, नाटक, निबंध, एकांकी, जीवनी, आत्मकथा, संस्मरण, यात्रा वृतांत, समीक्षा आदि विषय आते हैं। इसी तरह कहानी भी गद्य विधा के अंतर्गत आती है। इस गद्य विधा के अंतर्गत कहानी, नाटक और उपन्यास को कथा साहित्य कहा जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि नाटक, कहानी और उपन्यास के माध्यम से हम एक मनोदशा को पाठक के सामने रखते हैं। जिसमें श्रृंगार, करुणा, हास्य, प्रेम, ईर्ष्या, रोमांस, रहस्य, जिज्ञासा मनोरंजन आदि भाव सम्मिलित होते हैं।

यदि हम कहानी की शुरुआत की बात करें तो हम बिना संकोच के कह सकते हैं कि जब से मानव जाति ने भाषा सीखी है तब से कहानी कहने और सुनने की परंपरा का आरंभ माना जा सकता है। क्योंकि किसी भी भाव भंगिमा को प्रकट करने के लिए हमें भाषा की आवश्यकता होती है। और वह एक परिष्कृत भाषा होनी चाहिए जिसके माध्यम से हम अपने भाव और विचार को स्पष्ट रूप से सामने वाले व्यक्ति को बता सके।

चलिए इस विषय को एक व्यवहारिक उदाहरण के माध्यम से समझते हैं। अक्सर जब हम बाहर घूमने जाते हैं पार्क में, स्कूल में, कॉलेज में, सड़क पर आदि विभिन्न स्थानों पर। हम देखते हैं कि सड़क पर या किसी भी अन्य स्थान पर कई सारे लोग इकठ्ठा होकर आपस में लड़ाई या झगड़ा कर रहे हैं। तो हम रुककर वहां पर यह जानने का प्रयास करते हैं कि ऐसा क्या हुआ कि लोग आपस में लड़ रहे हैं?  यहां पर रुकने का मकसद हमारा यह है कि हम यह जाने का प्रयास करते है कि आखिर किस वजह से लोग आपस में लड़ रहे हैं।

तो कहीं न कहीं हम उस लड़ाई के पीछे की कहानी जानने का प्रयास करते हैं। हम वहां पर रुककर जो पहले से वहां पर मौजूद व्यक्ति है, तो उससे पूछते हैं कि भाई साहब, क्या हुआ? क्यों इतनी भीड़ जमा हुई है? क्यों ये दो व्यक्ति आपस में लड़ रहे हैं? तो वह व्यक्ति हमारी भाषा और भाव को समझता है फिर हमारे भाषा में जवाब देता है। फला दो व्यक्ति हैं। ऐसा-ऐसा बात हो गई है और आपस में लड़ रहे हैं। तो कहीं न कहीं हम उस व्यक्ति से उन दोनों लोगों के बीच हुई लड़ाई की वजह जानते हैं।

जो कहीं ना कहीं एक कहानी के रूप में होता है। वह हमें एक सुस्पष्ट भाषा में भी बताता है। तो हम यह भी कह सकते हैं कि कहानी किसी घटना का वृतांत है। घटना जितनी बड़ी होगी, कहानी उतनी ही बड़ी होगी। घटना जितनी छोटी होगी कहानी भी उतनी छोटी होगी। उस कहानी को सुनने और कहने के लिए हमें एक भाषा की भी जरूरत होती है। जो कहने वाले और सुनने वाले उस भाषा से सुपरिचित होते हैं। यदि हम उस भाषा से परिचित नहीं होंगे तो हम उस कहानी के मूल भाव को नहीं समझ सकते। इसलिए हमें भाषा का ज्ञान होना अति आवश्यक है।

कहानी के भेद-

वर्तमान समय में जो कहानी का स्वरूप है। वह आधुनिक युग की देन है। कहानी का आधुनिक स्वरूप पाश्चात्य अंग्रेजी साहित्य से होते हुए बंगाल के बुद्धिजीवियों के माध्यम से बांग्ला साहित्य में समाहित होती है और भारतीय रंग में ढल जाती है। भारत में प्राचीन काल से कहानी कहने और सुनने की प्रथा थी। ऋग्वेद में भले ही कहानी के मूल तत्व न मिले पर महाभारत, पुराण, बौद्ध साहित्य, हितोपदेश, पंचतंत्र आदि में भारतीय मूल भाव की कहानियों का भंडार है।

वर्तमान समय में कहानी को उसके स्वरूप के आधार पर मुख्यतः तीन भागों में बांटा गया है कहानी, लघु कथा और लंबी कहानी।

आप इन तीनों आधार को आकार के हिसाब से विभाजित करने का कभी प्रयास मत करिएगा। ऐसा नहीं है कि कोई कहानी आकार में छोटी है तो लघु कहानी हो गई। और आकार में बड़ी है तो लंबी कहानी हो गई। यह इसके विभाजन का बिल्कुल पैमाना नहीं है, बल्कि तात्विक भेद है।

लघु कहानी में मात्र मुख्य घटना को दर्शाया जाता है। जो कहानी का मुख्य कथानक होता है। लघु कहानी में कहानीकार कभी भी पात्र का चरित्र चित्रण, परिवेश आदि विषय को छोड़कर मात्रा घटना का वर्णन कहानी में करता है। लघु कहानी में कहानीकार आपको कोई उपदेश नहीं देगा। वह घटना बात कर चला जाएगा और सही और गलत का फैसला आप करेंगे। क्योंकि लघु कहानी की घटनाएं इतनी तात्विक और जीवंत होती है कि वह सीधे हमारे मन मस्तिष्क पर प्रभाव डालती हैं। हमारे नजरिए को प्रभावित करती हैं और एक पूर्ण यथार्थ को दिखाती है।

जब कहानीकार कहानी के सभी तात्विक भेदों को एक-एक करके कहानी के कथानक के माध्यम से वर्णन करता है। तो वह कहानी विस्तार पूर्वक होने के कारण लंबी कहानी कही जाती है। क्योंकि इस कहानी में कहानीकार ने सभी तात्विक भेदों का विस्तार से वर्णन किया और उसकी कसौटी पर कहानी के कथानक का निर्माण किया है। लंबी कहानी के कथानक के माध्यम से कहानीकार कोई न कोई उपदेश या विचार पाठक के सामने रखता है। जो समाज के मध्य एक ज्वलंत मुद्दा होता है। कभी-कभी लंबी कहानी में एक ही घटना का वर्णन सभी तात्विक भेदों के आधार पर किया जाता है। और बहुत सारी घटनाओं का भी वर्णन उन्हीं भेदों के आधार पर किया जाता है।

निष्कर्ष-

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि लघु कथा एकांकी होती है। उसमें संक्षिप्त होती है। तीखेपन का भाव होता है। व्यंग्य घटना और मनोरंजन को ध्यान में रखकर लिखा जाता है। वही लंबी कहानी में कहानीकार जीवन की संपूर्ण जटिलताओं का विस्तृत कथानक और कहानी के तात्विक भेदों के माध्यम से पाठक और श्रोता के मध्य रखता है।

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