
नवजागरण काल ने व्यापक तौर पर भारतीय जीवन, भाषा, साहित्य, दर्शन और विचार को प्रभावित किया। स्वयं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की रचनात्मक प्रतिभा इस पुनर्जागरण काल से उन्नत रूप में जुटती है जिन्होंने मध्ययुगीन संकुचित घेरे से साहित्य को उन्मुक्त कर आधुनिकता का संवाहक बनाया है और विभिन्न बन्तविरोत्री स्थितियों से जुटते हुए युगीन चेतना का नया संस्कार किया है। भारतेन्दु और भारतेन्दुयुगीन अन्य रचनाकारों ने जनता को इच्छा, आकांक्षाओं, असन्तोषों, उत्पीड़नों को अभिव्यक्त किया। भक्ति-आन्दोलन के बाद यह दूसरी महत्वपूर्ण घटना थी कि साहित्य को जनोन्मुख बनाया गया ।
जिसे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कहा- ‘साहित्य जनता की ओर मुड़ा।’ लोकबद्ध हुए अंग्रेजी राज के अधीन जीती भारतीय जनता के लिए यह तो मुश्किल ही था कि वह अपने अनुकूल परिवेश का निर्माण कर सके। परन्तु नयी परिस्थितियों के दबाव और औपनिवेशिक दासता से मुक्ति की चाहत के कारण अन्ध-विश्वासों और रूड़ मूल्यों से छुटकारा लेने लगी थी। फलतः रचनात्मकता के नये-नये रूपों की सर्जना हुई। निबन्ध, नाटक, विभिन्न पत्र-पत्रिकायें और उपन्यासों का निर्माण हुआ, जिस लेखन-कार्य की अगुवाई स्वयं भारतेन्दु ने की।
औपनिवेशिक दासता से मुक्ति लेने के लिए भारतीय जनता के भीतर जातीय स्वाभिमान और आत्मबल के भाव को जागृत करना नितान्त जरूरी था। जब तक व्यापक भारतीय जनता आलोचना-प्रत्यालोचना के दौर से नहीं गुजरेगी तब तक ब्रिटिश शासकों से उसकी लड़ाई जीवंत रूप नहीं ग्रहण कर सकती थी।
अतः जरूरी था भारतेन्दु के ही शब्दों में ‘स्वत्व निज भारत गहे’ भारतीय जनता अपनी अस्मिता को अपनी सत्ता को पहचाने। इसके लिए जातीय भाषा के रूप में खड़ी बोली हिन्दी का विकास भी भारतेन्दु युग की महत्वपूर्ण देन है। ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल’ का नारा भारतेन्दु ने दिया ताकि एक भाषा के माध्यम से सारे देश की जनता एकजुट हो स्वाधीनता की लड़ाई मजबूती के साथ लड़ सके ।
अतः भारतेन्दु के साहित्य का भी प्रमुख स्वर देशभक्ति के राष्ट्रीय भाव को जनता के भीतर जगाना था जिसके लिए कभी गौरवशाली अतीत की उज्जवल तस्वीर खीचें तो कभी युगीन दबाव में परिवर्तन की आकांक्षा प्रबल रूप ले लेती है। नवजागरण काल में अंग्रेजों के दुश्चक्र से मुक्ति की आकांक्षा और समाज-सुधार का भाव प्रबल रूप लेता है।
फलतः परिवेश की कोई भी छोटी-बड़ी बात इनके रचना का विषय बनती थी, मानव जीवन के प्रति सहज लगाव महसूस किया। इन्होंने ब्रिटिश की निर्ममता, लूट-खसोट, आर्थिक वैमनष्य का पर्दाफाश अनेक निबंधों और भाषणों में किया। औपनिवेशिक शासक किस तरह यहाँ की अर्थव्यवस्था को पंगु बना रहा था। ब्रिटिश शासकों के चालाक और और धूर्त इरादों को भारतेन्दु की सजग दृष्टि बखूबी देख रही थी।
नवजागरण काल देश के किसी एक भाग को प्रभावित नहीं करता वरन् वह देश के विभिन्न क्षेत्रों में जागृति लाता है। यही कारण है राजनीतिक, आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक, सांस्कृतिक सुधारपरक आदोलन में पूरे देश के पैमाने पर तेजी आती है। भारतेन्दु के साहित्य में भी सामाजिक कुरीतियों, छुआ-छूत, जाति-पाति, बाल-विवाह का विरोध, विधवा विवाह का समर्थन मिलता है।
उन्होंने विदेशी संस्कृति के जातीय-जीवन पर पड़ने वाले विकृत्त प्रभाव को भी लक्षित किया। अंग्रेजी राज्य के अन्याय-अत्याचार का दृढ़ विरोध और भारतीय अस्मिता की पहचान भारतीय जीवन में आत्मविश्वास और आत्मगौरव का भाव जागृत करना ही भारतेन्दु के साहित्य का प्रधान लक्ष्य था।
अंग्रेजों की चापलूसी करनेवाले अंग्रेज भक्तों पर भी तीखा व्यंग्य मिलता है। धार्मिक अन्धविश्वास, संकीर्णता, रूढ़िवाद का विरोध भी चुभती भाषा में किया। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक और साम्प्रदायिक सद्भाव के हिमायती थे। बलिया वाले भाषण में भी बड़े उन्होंने जोरदार शब्दों में हिन्दू-मुस्लिम एकता की हिमायत की। अंग्रेजी भाषा की शिक्षा, छोटे-मोटे सुधारों और धर्म की ओट में भारतीय मानसिकता को गुलाम बनाये रखने की अंग्रेजों की साजिश को भी भारतेन्दु ने गहरे रूप में अनुभव किया।
फिर भी युगीन परिवेश में अंग्रेजों द्वारा किये गये सुधार-कार्यों को देखकर उनकी प्रशंसा भी करते हैं। विक्टोरिया शासन-काल में शान्ति, सुरक्षा-व्यवस्था और सुधार कार्यों को देखकर उसकी प्रशंसा तो भारतेन्दु कर जाते हैं पर उनकी निर्मम लूट-खसोट, धूर्त्तता और चालाकी को भी बड़ी बारीकी से उजागर करते हैं। यही उनकी प्रगतिशीलता है। कम से कम ब्रिटिश शासकों के शोषक चरित्र की पहचान तो करते हैं। जन-जीवन के साथ जुटकर अपनी रचनार्धामता को आगे बढ़ाते हैं। जातीय भाषा के रूप में खड़ी बोली हिन्दी पर जोर देते हैं।
भारतीय जनता के समुचित विकास पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। फिर भारतेन्दु का जन्म जिस रूढ़, संस्कारी परिवार में हुआ, राजभक्ति तो उनके खून में प्रवाहित हो रही थी पर निरन्तर उन भावों से संघर्ष करते हुए देशहित और समाजहित से रिश्ता जोड़ते हैं। देश और समाज की समस्याओं से टकराते हुए उन्होने समकालीन यथार्थ को ठोस अभि-व्यक्ति दी। औपनिवेशिक शासन के लूट और शोषण को भारतीय जनता के दुःखों का मूल कारण मानते हुए उनमें जागृत्ति पैदा करनी चाही ताकि विदेशी शासन से मोर्चा ले सके।
‘हिन्दी भाषा की उन्नति’ पर व्याख्यान देते हुए एक ओर ‘निज भाषा’ उन्नति को बात उठाते हैं वहीं भारतीयों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार शासक वर्ग के विरुद्ध जोरदार ढंग से जनता की जागृति का आह्वान भी करते हैं। कबीर की तरह ही एक बार फिर से पुनर्जागरण के दौर में भारतेन्द्र के मन में यह सवाल पैदा होता है कि- ‘होय मनुष्यहि क्यों भये हम गुलाम वे भूव ।
‘मनुष्य मात्र की समता के हिमायती भारतेन्दु में अदम्य संघर्ष-शीलता और साहस के दर्शन होते हैं। आज जब पूँजीवादी संकट गहराता जा रहा है तो भारतेन्दु के साम्राज्यवाद विरोधी तेवर प्रासंगिक मालूम देते हैं। आज जिस तरह सामन्ती समाज की बनिस्बत पूँजीवादी शोषण का तरीका और बारीक तथा धारदार हो गया है, भारतेन्दु की ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं-
भीतर-भीतर सत्र रस चूसै, हँसि-हँसि के तन-मन-धन चूसें । जाहिर बातन में अति तेज, क्यों सखि, सज्जन नहीं अंगरेज ।”
कूपमंडूक बने सहिष्णु चरित्र वाले लोगों को ‘मूर्ख’ कहते हुए फटकारा और भौतिक उन्नति की ओर अग्रसरित होने की प्रेरणा दी। भारतेन्दु ने तो धर्मग्रंथों को भी जातीय भाषा में होना जरूरी बताया ताकि लोग उसका सही अर्थ समझ सकें और पण्डितों द्वारा फैलाये गये भ्रमों से दूर रहे।
इस सांस्कृतिक, सामाजिक जागरण के दौर में जरूरी था कि हिन्दू-मुस्लिम सभी धर्म वाले लोग एकजुट होकर साम्राज्यवादी ताकतों के विरुद्ध आवाज उठायें तभी उससे मुक्ति मिल सकती है। उनका कहना था आपसी फूट और कलह भीतर से कमजोर बना देती है और अँग्रेज इस फूट का नाजायज फायदा उठाकर अपनी जड़ें और मजबूत करते थे ।
भारतेन्दु ने सर्वसाधारण में जागृति फैलाने के लिए भारत के प्राचीन वैभव, उनके समृद्धशाली अतीत का स्मरण कराकर उनमें राष्ट्रीय भावनाओं को जगाने का प्रयत्न किया। भारतेन्दु प्राचीन संस्कृति और प्राचीन इतिहास को भारतीय जनता के नवजागरण के लिए प्रेरक शक्ति बना देना चाहते थे। इसी देश-प्रेम के भाव से उत्प्रेरित होकर स्वयं इतिहास और प्रातत्व का भी अध्ययन किया ।
भारतेन्दु हिन्दी-साहित्य के विकास के साथ-साथ विभिन्न कलाओं की उन्नति भी चाहते थे। इन्होंने अपने विभिन्न नाटकों और निबन्धों में स्त्रो-शिक्षा पर भी जोर दिया । बाल-विवाह का विरोध और विधवा-विवाह का समर्थन किया। क्योंकि नवजागरण के दौर में समाज का हर हिस्सा जागृत हो तभी व्यापक रूप से आन्दोलन सम्भव है। स्त्रियाँ भी समाज का ही अंग हैं।
अतः उनका भी घर की चहरदीवारी से बाहर निकलकर समाज के बीच आना और अपनो अहम् भूमिका अदा करना बहुत जरूरी था; ऐसे समय में जब स्त्रियाँ मात्र भोग-विलास की ‘वस्तु’ समझी जाती थीं। भारतेन्दु ने स्त्रियों की स्वतन्त्रता, शिक्षा और नारी मुक्ति की बात की। यद्यपि यह समस्या आज भी स्वतन्त्र भारत में किसी न किसी रूप में मौजूद है। विधवाओं के प्रति भी परम्परा से अपनाये गये नैतिक मानदण्डों में परिवतन लाने की बात भी कही।
इस प्रकार भारतेन्दु का समूचा साहित्य युगीन संवेदना से पूरी तरह जुटा हुआ, यथार्थ के तीखे तेवरों से युक्त है। इन्होंने सामाजिक रूढ़ियों, धार्मिक मिथ्याचारों, अनाचारों, छल-कपट, मानसिक दासत्व और निष्क्रियता के बन्धन से जकड़े हुए गुलाम भारतीयों, देश के स्वार्थपरस्त अमीरों, विश्शृंत्वलित होती आर्थिक व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठायो ।
अतः इस दौर में सामाजिक और साहित्यिक समस्याओं का समानान्तर इतिहास मिलता है। क्योंकि बदले हुए परिवेश के लिए केवल पद्य ही पर्याप्त नहीं था। ब्रजभाषा भी चुक रही थी। ब्रिटिश शासन से मुक्ति लेते, आत्मनिर्भर स्वदेशी समाज के निर्माण हेतु अपने देश के स्वाभिमान और गौरव के अनुरूप अपनी भाषा, साहित्य ओर संस्कृति का विकास नितान्त आवश्यक था और भारतेन्दु का साहित्य इस चुनौती का ‘जीवंत दस्तावेज ‘है।
हिन्दी साहित्य में नाट्य-लेखन की भी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने मजबूत नींव रक्खी। सम्भवतः ऐवा करते हुए उनका ध्यान सबसे पहले संस्कृत की समृद्ध नाट्य-परम्परा की ओर गया और उन्होंने चाहा कि संस्कृत की ही तरह हिन्दी में नाट्य-लेखन परंपरा की शुरुआत हो ।
भारतेन्दु का जन्म १८५० ई० में हुआ था। बाप प्रसिद्ध सेठ अमीचन्द के वंशज थे और आपके पिता बाबू गोपालचन्द्र उपनाम गिरिधरदास हिन्दी के अच्छे कवि और अपने समय के प्रगतिशील व्यक्तियो में से थे। जब भारतेन्दु पाँच वर्ष के थे तब आपकी माता पार्वती देवी का बीर जब दस वर्ष के थे तब आपके पिता का देहान्त हो गया। पिता की असामयिक मृत्यु हो जाने के कारण आपकी शिक्षा का समुचित प्रबंध न हो सका।
यद्यपि आप तीन-चार वर्ष तक बनारस के क्वीन्स कॉलेज में बराबर पढ़ने जाते थे, किन्तु आपने जो कुछ ज्ञान प्राप्त किया वह स्वाध्याय द्वारा। आप भारतवर्ष की लगभग सभी प्रधान भाषाएँ जानते थे । पांच-छः वर्ष की अवस्था में ही आपने अपनी काव्य-प्रतिभा का परिचय देना प्रारम्भ कर दिया था। पन्द्रह वर्ष को अवस्था में आपका विवाह मन्त्रा देवी से हुआ। विवाह के बाद आपने अनेक स्थानों की यात्रा की और अवसर मिलने पर सदैव अंध-विश्वास और अप्रामाणिकता का विरोध किया।
आपने स्वदेशी, निज-भाषा-उन्नति, राष्ट्रीयता, भारत की उन्नति, स्त्री शिक्षा आदि बातों पर सदैव जोर दिया। ६ जनवरी, १८८५ को चौतीस वर्ष चार महीने की अवस्था में आपका देहान्त हो गया। आपके दो पुत्र और एक पुत्री हुई थी। किन्तु पुत्रों का बाल्यावस्था में ही देहांत हो गया। आपकी पुत्री विद्यावती एक विदुषी महिला थी। आपकी लोकप्रियता का प्रमाण इसी से मिलता है कि सारे देश ने आपको भारतेन्दु’ को उपाधि प्रदान की।
भारतेन्दु की प्रतिभा चौमुखी थी और आपने विविध प्रकार से हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाया। आपका व्यक्तित्व तत्कालीन शिक्षित धनिकवर्ग को विशेषताएँ लिये हुआ था । आपने जीवन-भर, देश, भाषा और साहित्य की सेवा की। सावजनिक जीवन ग्रहण करते हुए आपने ‘कविवचन सुधा’ (१८६८), ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ (१८७३) आदि पत्रों का संपादन किया। भारतीय इतिहास के संधि काल में आविर्भाव होने से आपने नवीन और प्राचीन, पाश्चात्य और भारतीय विषयों का सुन्दर समन्वय उपस्थित कर भावी उन्नति के मार्ग का सृजन किया।
अंग्रेजी राज्य की स्थापना के फलस्वरूप जो राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और साहित्यिक परिवर्तन हो रहे थे उनके प्रति आप जागरूक थे। आपका जीवन-काल भारतीय नवोत्थान का प्रथम चरण था। यह नत्रोत्थान एक ओर तो अतीत से प्रेरणा ग्रहण कर रहा था और दूसरी ओर उसको दृष्टि भविष्य पर लगी हुई थी। ‘प्रेमधन’, बालकृष्ण भट्ट, तोताराम वर्मा, प्रतापनारामण मिश्र, श्रीनिवासदास आदि ने भारतेन्दु के नेतृत्व में तत्कालीन जीवन के हीन और उज्ज्वल दोनों पक्षों पर दृष्टिपात कर देश के मंगलमय भविष्य को अवतारणा की।
~दीनबंधु, बीए.आनर्स (हिन्दी), ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज
‘भारत-दुर्दशा’ समीक्षा…https://www.bhojkhabar.com/%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a4%be1/