
जाति-व्यवस्था, जिसने भारतीय समाज को अपने आलिंगन में भर लिया है, और भविष्य में भी शायद भर कर ही रखेगा। इस व्यवस्था ने हर क्षेत्र में नियमित रूप से विकास किया है। इसका उदाहरण प्रेमचंद की ‘सद्गति’ कहानी से लेकर उदय प्रकाश के ‘पीली छतरी वाली लड़की’ लघु-उपन्यास (लंबी कहानी) तक देखा जा सकता है। दोनों ही रचनाओं में इस व्यवस्था को दर्शाया गया है और कहानी के अंत तक मुख्य पात्रों द्वारा इसे तोड़ने का एक असफल प्रयास किया गया है।
एक ओर ‘सद्गति’ कहानी में दुखिया चमार द्वारा बार-बार लकड़ी (वर्ण-व्यवस्था) पर प्रहार करने के पश्चात भी वह उसे नहीं तोड़ पाता। अंत में लकड़ी फट तो जाती है, लेकिन वह भी गिर पड़ता है; अर्थात “शरीर जवाब दे गया, लेकिन व्यवस्था नहीं टूट पाई। ” दूसरी ओर, ‘पीली छतरी वाली लड़की’ में कमरा नंबर 252 का वह दिल दहला देने वाला दृश्य है, जब कहानी के मुख्य पात्र राहुल और अंजलि (ब्राह्मण परिवार की लड़की) कमरे में शारीरिक अंतरंगता—अपने रिश्ते को और मजबूत करने वाली प्रक्रिया—में संलग्न थे।
उस समय राहुल के अंतर्मन की जो व्यथा उसे सता रही थी, वह ‘वर्ण-व्यवस्था’ के प्रति उसके मन में भरा रोष था, जो उस व्यवस्था को तोड़ने की तीव्र आकक्षां में बदल गया। अंत में राहुल द्वारा अंजलि पर किए गए वे तीव्र प्रहार…उस समय राहुल उसे अपनी प्रेमिका के रूप में न देखकर, एक ब्राह्मण परिवार और समाज की लड़की के रूप में देख रहा था। वह किसी भी प्रकार उससे जीतना चाहता था; वह अंजलि के माध्यम से उस व्यवस्था को तोड़ना चाहता था।
लेकिन अंत वही आत्मग्लानि और शर्मिंदगी पर वह प्रक्रिया समाप्त होती है कि किसी एक व्यक्ति से जीतकर या उस पर हावी होकर आप पूरी व्यवस्था को नहीं तोड़ सकते। समाज ने सदैव स्त्री को वस्तु-समान माना ही है—चाहे जयशंकर प्रसाद का ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक देखें या मंटो की ‘हतक’ कहानी, दोनों में ही स्त्री, पुरुष-प्रधान समाज के लिए वस्तु-समान रही है।
जैसा कि शुरू में ही कहा गया है कि वर्ण-व्यवस्था नियमित रूप से विकास की ओर अग्रसर रही है और आधुनिक युग में इसका एक नया रूप हमारे सामने आया है, जिसे “मैनुअल स्केवेंजगिं” (Manual Scavenging) के रूप में जाना गया है। मैनुअल स्केवेंजगिं अर्थात हाथ से मैला ढोने को सार्वजनिक सड़कों से, शुष्क शौचालयों से मानव-मल को हटाने, और सेप्टिक टैंकों, नालियों एवं सीवरों की सफाई के रूप में परिभाषित किया गया है।
वर्ण-व्यवस्था की उपस्थिति यन्हा भी पूरी तरह से कायम है। “हिन्दू समाज में नीची से नीची समझी जाने वाली जाति भी अपने से नीची जाति ढूंढ लेती है।” वर्ण-व्यवस्था के अनुसार नाली और गटर की सफाई जैसे कार्यों के लिए नीची जाति/समुदाय के लोग ही “उपयुक्त” माने जाते हैं। इस कार्य—अर्थात नाली और गटर साफ करने—में लोगों को अपनी जान तक गँवानी पड़ती है।
कई निकायों द्वारा सीवर-सफाई जैसे कार्यों के लिए निजी ठेकेदारों से अनुबंध किया जाता है, परंतु इनमें से कई ‘फ्लाई-बाय-नाइट ऑपरेटर्स’ (Fly-by-night operators) सफाई कर्मचारियों की मृत्यु होने पर उनसे किसी भी प्रकार का संबंध होने से इनकार कर देते हैं। उदाहरण के लिए, ‘सद्गति’ कहानी में दुखिया चमार का शोषण करने के बाद उसकी लाश के साथ जैसा व्यवहार होता है, वैसा ही कुछ यहाँ भी देखने को मिलता है।
सरकार द्वारा वर्ष 1989 में ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम’, 2013 में ‘एमएस एक्ट’ (अस्वच्छ शौचालयों का निर्माण और रखरखाव तथा हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध अधिनियम), 2020 में इसका संशोधन विधेयक, ‘स्वच्छता अभियान ऐप’ और ‘विश्व शौचालय दिवस’ जैसे बड़े कार्यक्रम व नियम लाए गए।
लेकिन प्रश्न यह है कि ऐसे नियम लाने में इतना समय क्यों लग गया? क्या ये नियम-कानून भारतीय समाज के लोगों की मानसिकता बदल पाएँगे? या श्रीलाल शुक्ल की भाषा में कहें तो: “अछूत एक प्रकार के दोपाये का नाम है, जिसे लोग संविधान लागू होने से पहले छूते नहीं थे।
संविधान एक कविता का नाम है, जिसके अनुच्छेद 17 में छुआछूत खत्म कर दी गई है; क्योंकि इस देश में लोग कविता के सहारे नहीं, बल्कि धर्म के सहारे रहते हैं, और छुआछूत इस देश का एक धर्म है। तो शिवपालगंज में भी दूसरों की तरह अछूतों के मोहल्ले थे…” कंही ये मैनुअल स्केवेंजगिं वाले नियम भी संविधान का एक अनुच्छेद बनकर ही न रह जाएँ, जो केवल पढ़ने, कहने और सुनने में ही अच्छे लगते हैं। धूमिल की कविता “रोटी और संसद” के तीसरे आदमी से एक प्रश्न पूछना चाहूँगा। कब तक मौन रहोगे?
~सिद्धार्थ, बीए.आनर्स (हिन्दी), ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज