
‘दीवार में एक खड़की रहती थी’ विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास है। इसका प्रकाशन 1997 में हुआ। इस उपन्यास में एक साधारण जीवन और उसमें रहने वाले लोगों की छोटी-छोटी इच्छाओं, सपनों और संवेदनाओं को सामने रखा गया है। लेखक ने साधारण जीवन को बहुत ही अलग और सुंदर तरीके से प्रस्तुत कया है। उपन्यास में रघुवर प्रसाद और सोनसी के माध्यम से एक सामान्य जीवन को दिखाया गया है।
दोनों का जीवन साधारण है, लेकिन इसी साधारण जीवन में प्रेम, अपनापन और छोटी-छोटी खुशियाँ दिखाई देती हैं। लेखक ने उनके जीवन को किसी बड़े घटनाक्रम के द्वारा नहीं, बल्कि रोजमरा की छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया है। इस उपन्यास की सबसे खास बात यह है कि इसमें साधारण चीजों को भी बहुत विशेष रूप में प्रस्तुत कया गया है। सामान्य-सी लगने वाली घटनाओं में भी लेखक कुछ नया और अलग दिखाते हैं।
इसी कारण उपन्यास को पढ़ते समय साधारण चीजें भी असाधारण लगने लगती हैं। कहानी में हाथी का भी जिक्र आता है। रघुवर प्रसाद टेम्पू से यात्रा करते हैं, लेकिन बाद में वे हाथी से रोजाना यात्रा करते हैं। यहाँ हाथी को भी एकदम साधारण रूप में प्रस्तुत कया गया है। इस प्रकार उपन्यास में असाधारण लगने वाली चीजों को भी बहुत सहज और साधारण तरीके से दिखाया गया है।
यही उपन्यास की विशेषता है कि इसमें साधारणता के अंदर भी एक अलग प्रकार की सुंदरता दिखाई देती है। रघुवर प्रसाद और सोनसी के बीच का प्रेम बहुत सहज और सामान्य है। इसमें किसी प्रकार का दिखावा नहीं है। दोनों के संबंधों में एक-दूसरे के प्रति अपनापन और संवेदना दिखाई देती है। इस प्रेम के माध्यम से लेखक ने मानवीय संवेदनाओं को बहुत सरल तरीके से प्रस्तुत कया है।
उपन्यास में ‘खड़की’ का भी विशेष महत्व है। खड़की केवल एक साधारण वस्तु नहीं रह जाती, बल्कि उसके माध्यम से एक अलग दुनिया दिखाई देती है। दीवार के बीच बनी खड़की बाहर की दुनिया, प्रकृति और कल्पना से जुड़ने का माध्यम बनती है। इस प्रकार खड़की उपन्यास में एक महत्वपूण प्रतीक के रूप में दिखाई देती है। उपन्यास में कल्पना और यथार्थ दोनों साथ-साथ चलते हैं।
लेखक ने वास्तवक जीवन की घटनाओं को कल्पना के साथ इस प्रकार जोड़ा है क कई बार दोनों के बीच का अंतर कम हो जाता है। सामान्य जीवन की घटनाओं में भी एक अलग तरह की कल्पना और आकर्षण दिखाई देता है। प्रकृति का भी उपन्यास में सुंदर चित्रण मिलता है। खड़की के माध्यम से बाहर की दुनिया और प्रकृति को देखने का अवसर मिलता है।
प्रकृति केवल बाहर का दृश्य नहीं है, बल्कि वह पात्रों के जीवन और उनकी संवेदनाओं से भी जुड़ जाती है। विनोद कुमार शुक्ल की भाषा बहुत सरल और सहज है। उनकी भाषा में कविता जैसा सौंदय भी देखने को मिलता है। वे सामान्य जीवन की बातों को सामान्य शब्दों में ही इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि उनमें एक अलग सुंदरता दखाई देने लगती है।
उदाहरण के रूप में— “उसी दीवार में एक खड़की रहती थी, उस खड़की के कारण एक दृश्य रहता था, एक झोंपड़ी, दो पगडंडियाँ, एक नदी, दो-चार तालाब, एक ही आसमान, सबका काम चलाता था।” इस उदाहरण से उनकी भाषा की सरलता और उसमें मौजूद काव्यात्मक सुंदरता दखाई देती है।
उपन्यास में वास्तवक जीवन के साथ कल्पना का ऐसा मेल दिखाई देता है कि कई घटनाएँ सामान्य होते हुए भी कुछ अलग और जादुई लगती हैं। लेखक साधारण जीवन को ही इस तरह प्रस्तुत करते हैं क उसमें एक अलग प्रकार का आकर्षण पैदा हो जाता है।
इस प्रकार ‘दीवार में एक खड़की रहती थी’ एक ऐसे साधारण जीवन की कहानी है, जिसमें प्रेम, कल्पना, प्रकृति और मानवीय संवेदना दिखाई देती है। इसकी विशेषता यही है कि लेखक ने सामान्य जीवन की छोटी-छोटी बातों को बहुत सुंदर और अलग तरीके से प्रस्तुत किया है। साधारणता, सरल भाषा, प्रेम, संवेदना और कल्पना इस उपन्यास को विशेष बनाते हैं।
~ चेतना, हिन्दी (विशेष), ज़ाकिर हुसैन दिल्ली महाविद्यालय
‘कानों में कंगना’ राधिका रमण प्रसाद सिंह…https://www.bhojkhabar.com/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%ae/