ईदगाह — प्रेमचंद की कहानी की आलोचनात्मक समीक्षा

प्रेमचंद द्वारा रचित ‘ईदगाह’ हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध कहानियों में से एक है, जिसका प्रकाशन 1933 में हुआ। इस कहानी का मुख्य पात्र हामिद है तथा अन्य प्रमुख पात्रों में उसकी दादी अमीना और उसके मित्र शामिल हैं। सामान्यतः इस कहानी को प्रेम, त्याग, संवेदनशीलता और पारिवारिक लगाव की कहानी के रूप में देखा जाता है। लेकिन यदि इसे बाल-मनोविज्ञान और सामाजिक परिस्थितियों के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह कहानी कुछ ऐसे प्रश्न भी उत्पन्न करती है, जिन पर विचार करना आवश्यक है।

कहानी की शुरुआत ईद के दिन से होती है। हामिद लगभग चार-पाँच वर्ष का एक छोटा बच्चा है, जो अपने मित्रों के साथ मेले में जाता है। मेले का वातावरण, खिलौने, मिठाइयाँ और अन्य आकर्षक वस्तुएँ स्वाभाविक रूप से बच्चों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। इस उम्र में बच्चे सामान्यतः अपनी इच्छाओं, उत्सुकताओं और अनुभवों के माध्यम से दुनिया को समझते हैं। उनके लिए मेले का अर्थ आनंद लेना, नई चीजें देखना और अपनी पसंद की वस्तुएँ खरीदना होता है।

लेकिन हामिद का व्यवहार कहानी को एक अलग दिशा में ले जाता है। जब दूसरे बच्चे खिलौने और मिठाइयाँ खरीदते हैं, तब हामिद अपनी दादी अमीना के बारे में सोचता है, जिनके हाथ रोटियाँ बनाते समय तवे से जल जाते हैं। वह अपने लिए कोई खिलौना या मिठाई खरीदने के बजाय एक चिमटा खरीदने का निर्णय लेता है, ताकि उसकी दादी के हाथ न जलें।

यहाँ कहानी का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—क्या इतनी कम उम्र में अपने सुख से पहले किसी दूसरे की आवश्यकता के बारे में सोचना पूरी तरह स्वाभाविक है? निस्संदेह, बच्चों में भी प्रेम, संवेदना और दूसरों के प्रति चिंता की भावना होती है। इसलिए हामिद का अपनी दादी के प्रति स्नेह अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। लेकिन जिस उम्र में उसकी अपनी इच्छाओं और अनुभवों का विस्तार होना चाहिए, उस उम्र में अपनी दादी की तकलीफ को प्राथमिकता देना हमें उसकी परिस्थितियों पर विचार करने के लिए भी प्रेरित करता है।

मेरे विचार से, हामिद के इस व्यवहार को केवल परिपक्वता या त्याग का उदाहरण मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे गरीबी, अभाव और पारिवारिक परिस्थितियों की भूमिका को भी समझना आवश्यक है। आखिर यह कैसी सामाजिक व्यवस्था है, जिसमें एक छोटे बच्चे की संवेदनाएँ उसकी अपनी इच्छाओं से पहले जागने लगती हैं? जिस उम्र में वह मेले के खिलौनों से खेल सकता था, मिठाइयों का आनंद ले सकता था और अपने बचपन को जी सकता था, उसी उम्र में वह अपनी दादी की शारीरिक पीड़ा को कम करने के बारे में सोच रहा है।

यह स्पष्ट है कि हामिद की संवेदनशीलता उसकी विशेषता है, लेकिन क्या इस संवेदनशीलता को केवल उसकी महानता के रूप में देखना उचित होगा? क्या हमें यह भी नहीं सोचना चाहिए कि गरीबी और अभाव बच्चों को समय से पहले जिम्मेदार बनने के लिए विवश कर सकते हैं? जिस व्यवहार को हम परिपक्वता कहकर सराहते हैं, उसके पीछे कभी-कभी परिस्थितियों की विवशता भी छिपी होती है।

यदि हामिद के निर्णय को परिपक्वता का मूल बिंदु माना जाए, तो भी एक प्रश्न अपनी जगह बना रहता है—लेकिन बचपन कहाँ गया? क्या एक बच्चे का अपने परिवार के प्रति संवेदनशील होना उसके अपने बचपन की सहज इच्छाओं से ऊपर हो जाना चाहिए? हामिद का निर्णय निस्संदेह प्रशंसनीय है, लेकिन यह विचार भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है कि उसे अपनी उम्र के अनुरूप इच्छाएँ पूरी करने के अवसर कितने मिले।

कहानी का एक आकर्षक प्रसंग वह है, जब हामिद के मित्र उससे चिमटा खरीदने का कारण पूछते हैं। वह चिमटे को कभी बंदूक, कभी मजीरे और कभी अन्य खिलौनों से अधिक उपयोगी बताकर अपने निर्णय को उचित सिद्ध करने का प्रयास करता है। यहाँ हामिद का बालसुलभ मन, उसकी कल्पनाशीलता और तर्क करने की क्षमता दिखाई देती है। वह अपने चिमटे को मित्रों के खिलौनों से कमतर नहीं मानता, बल्कि अपनी कल्पना के सहारे उसे अधिक उपयोगी बना देता है। इस प्रसंग से स्पष्ट होता है कि हामिद का बचपन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है; उसके भीतर अब भी खेल, कल्पना और अपनी वस्तु को श्रेष्ठ सिद्ध करने की बालसुलभ इच्छा मौजूद है।

हालाँकि, इस प्रसंग को केवल हामिद की चतुराई के रूप में देखने के बजाय उसके भीतर छिपे भावनात्मक पक्ष को भी समझना चाहिए। जहाँ उसके मित्र अपनी खरीदी हुई वस्तुओं के माध्यम से आनंद प्राप्त कर रहे हैं, वहीं हामिद अपने चिमटे की उपयोगिता बताकर अपनी पसंद को सार्थक सिद्ध करता है। यह संभव है कि वह अपने निर्णय से संतुष्ट हो, लेकिन यह भी विचारणीय है कि उसकी संतुष्टि के पीछे अपनी इच्छा का त्याग और अपनी दादी की चिंता कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

ईदगाह निष्कर्ष-

मेरे विचार से, हामिद की परिपक्वता उसकी शक्ति भी है और उसके सामाजिक यथार्थ का संकेत भी। उसकी संवेदनशीलता सराहनीय है, लेकिन उसके बचपन की सहज इच्छाओं का प्रश्न भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। यदि किसी बच्चे की समझदारी हमें गर्व से भर देती है, तो क्या हमें यह भी नहीं पूछना चाहिए कि उसे इतनी जल्दी समझदार बनने की आवश्यकता क्यों पड़ी? आखिर, हामिद की महानता की प्रशंसा करते हुए उसके बचपन के प्रश्न को हम कैसे अनदेखा कर सकते हैं?

~ चेतना, हिन्दी (विशेष), ज़ाकिर हुसैन दिल्ली महाविद्यालय 

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दीवार में एक खड़की रहती थी — समीक्षा…https://www.bhojkhabar.com/%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a4%be1/

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