
पंचलाइट समीक्षा-
फणीश्वरनाथ ‘ रेणु ’ हिन्दी साहित्य के सबसे प्रसिद्ध आंचलिक कहानीकार व उपन्यासकार हैं। उन्होंने अपनी सभी साहित्यिक रचनाओं को बिहार के ग्रामीण जीवन, विशेषकर पूर्णिया जिले के क्षेत्रों के समाज, संस्कृति और वहां के लोगों के संघर्षों का बहुत ही जीवंत चित्रण किया है तथा उस सामाजिक परिवेश को उजागर किया है। उन्हीं रचनाओं में से एक पंचलाइट है।
‘पंचलाइट’ रेणु की एक दिलचस्प और सामाजिक कहानी है,जो एक ग्रामीण व्यवस्था और सामाज की सामाजिकता को बारीकी से जीवंत करता हैं। कहानी की शुरूआत ही ग्रामीण विभाजन से होता है जिसमें महतो टोली, ब्राह्मण टोली, राजपूत टोली जैसे आवास स्थल जाति के आधार पे बंटे हैं। इसके साथ ही उस बंटवारे में आपसी भाईचारा और आदर का भी बंटवारा कर अपने क्षेत्रों में सीमित किया गया है।
कहानी पेट्रोमैक्स जिसे गाँव वाले लोग पंचलाइट कहते हैं। यूं तो पंचलाइट सभी टोलियों में थी, पर महतो टोली में नई आई है। सभी गांव के लोगों में उत्साह और खुशी की लहर दौड़ रही थी कि उनके पास भी पंचलाइट जैसा कोई उपकरण अब है। गांव के पांचों ने पंचलाइट के आगमन पर पूजा का आयोजन किया, जिसमें टोली की कीर्तन मंडली, बच्चे, बूढ़े सभी अपने घरों से छड़ीदार अगनू महतो के दुवार पर जमा हो गए।
सरदार ने सभी को बताया कि पंचलाइट कैसे और कितने भाव में खरीदा गया, कैसे उन्होंने ने दुकानदार से कितने पैसे में उसे लिया गया। सभी बैठे गांव के लोग उत्साह से सुन रहे थे क्योंकि उन्हें पंचलाइट की रोशनी को देखना था। परंतु अब यहां प्रश्न यह था कि उससे जलाया कैसे जाए? किसे आता है जलाना? ये खबर मिलते ही सभी के चेहरे पर अंधेरा छा गया और मन ही मन पंच और सभी सदस्यों की किरकिरी करने लगे।
गांव में सभी टोलियों में पंचलाइट थी और उसके जानकार भी थे, परंतु किसी और टोली के लोग से जलवा कर महतो टोली की नाक कौन कटेगा? किसी और से मदद ले कर कौन जीवनभर हंसी का पात्र बने इससे अच्छा जैसे का तैसा पड़ा रहे लाइट।
उतने में राजपूत टोली एक से तंज आया कान पकड़ कर पंचलाइट के सामने उठो-बैठो, तुरंत जलने लगेगा उस तंज ने गांव की प्रतिष्ठा और सम्मान को चुनौती दी।
गांव की गुलरी काली ने एक सलाह दिया कि गोधन को बुलाओ। गोधन गांव का एक नौजवान है जिसे पंचों ने फिल्मी गाना गाने के जुर्म में समाज से बहिष्कृत किया है। उसका पूरे गांव और समाज से कोई रिश्ता नहीं रखता और हुक्का-पानी भी प्रतिबंधित है। गोधन का चरित्र गाँव की सामाजिक व्यवस्थाओं की कमजोरियों को उजागर करता है, जबकि पंचों का व्यवहार ग्रामीण समाज की सामूहिक सोच को दिखात है।
गोधन के प्रयास से पंचलाइट में धीरे धीरे रोशनी फूटती है जिसके साथ ही गाँव के सभी लोग, कीर्तन शुरू करते है , महावीर स्वामी के जयकारे लगाते है। पंचलाइट के उजले से गोधन और गांव के लोगों के बीच सभी अंधकार भी खत्म होते है और गोधन को सब दिलों ही दिल में ही माफ़ कर देते है।
उद्देश्य-
इस कहानी में समाज की सामाजिक और अबोध ज्ञान का व्यवहार दिखता है। जिसे ग्रामीण सभ्यता में आम माना जाता है। इससे उनके जीवन, भाषा, उत्सुकता और देखने का नजरिया भी पाठक वर्ग को आकर्षित करता है। इससे ग्रामीण जीवन में आपसी मनमुटाव को तुरंत भूल कर साथ होना प्रमुख है।
साहिल सिन्हा
‘कानों में कंगना’ राधिका रमण प्रसाद सिंह…https://www.bhojkhabar.com/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%ae/