
‘भारत-दुर्दशा’ नाटक को स्वयं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने ‘नाट्यरासक’ को संज्ञा दी है, जो नवीन नाट्य-पद्धति का अनुकर्ता है। वस्तुतः नाट्य-रासक १८ उपरूपको में से एक है। नाट्य-रासक का लक्षण बताते हुए स्वयं भारतेन्दु ने लिखा है- ‘इसमें एक अंक, नायक उदात्त, नायिका वासक सज्जा, पीठमंद , उपनायक और अनेक प्रकार के गान नृत्य होते हैं।’ अन्य परिभाषा के अनुसार भी नाट्य रासक में एक अंक, नायक उदात्त, नायिका वासक सज्जा, उपनायक पीठमदं माना गया है।
लेकिन जो बात भारतेन्दु से भिन्न ठहरती है, वह है श्रृंगार या हास्य रस की प्रधानता । प्रतिमुख सन्धि को छोड़कर शेष चारों सन्धि का निर्वाह। पर भारतेन्दु द्वारा दी गयी परिभाषा का उल्लंघन भी इसी नाटक में हुआ है। जरूरत के अनुरूप फेर-बदल है- जैसे नाटक एक के बजाय छः अंकों में विभक्त है। यथास्थान वीर, शृंगार और करुण रसों का सन्निवेश है ।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपने ‘नाटक’ नामक निबन्ध में नाटकों के तीन प्रकार बताये – ‘काव्य मिश्र’, ‘शुद्ध कौतुक’ और ‘भ्रष्ट’ । बाजीगरी कठपुतली आदि के खेल ‘शुद्ध कौतूहल’ के अन्तर्गत आते हैं। इन्द्र सभा, रास, यात्रा, लीला, पारसी कम्पनियों के नाटक आदि ‘भ्रष्ट’ के अन्तर्गत और ‘काव्य-मिश्र’ में नवीन और प्राचीन तत्वों का सन्निवेश रहता है। इन नवीन नाटकों की रचना के पीछे शृंगार, हास्य, कौतुक, समाज संस्कार और देश-वत्सलता के भाव छिपे रहते हैं।
इस प्रकार भारतेन्दु के नाटक समन्वयात्मक दृष्टि के परिचायक है जिसमें समयानुकूल जनरुचि के अनुरूप प्राचीन के साथ नवीन का भी समन्वय है। प्रस्तुत नाटक ‘भारत-दुर्दशा’ ‘मिथ’ रचना है, जिसमें नवीन और प्राचीन नाट्य-पद्धतियों का समुचित सम्मिश्रण है। यही कारण है इनके नाटक का मूल्यांकन केवल आधुनिक नाट्य पद्धतियों की दृष्टि से ही नहीं किया जा सकता वरन् नाटक के शास्त्रीय तत्वों के निर्वाह की ओर भी इनकी दृष्टि गयी है।
शास्त्रीय तत्वों के विनियोजन के रूप में देखें तो कथा वस्तु, कार्यों की अवस्थाओं और सन्धियों के विभिन्न रूपों का वर्णन मिलता है। नवीनता की दृष्टि से हास्य, करुण, वीर रसों को प्रधानता, समाज-संस्करण और देशवत्सलता का भाव भी है। नाटक में छः अंक है। जिनमें प्रतीकात्मक ढंग से सामयिक यथार्थं को, नाटकीयता के साथ उपस्थित किया गया है जिसमें विभिन्न नवीन नाट्य-तत्वों के साथ भारतीय मानसिकता का अन्तविरोधी और परिणाम वर्णित है।
भारत-दुर्दशा नाटक का प्रारम्भ ही प्रतीकात्मक ढंग से होता है जिसमें विभिन्न मनोभावों का मानवीकरण किया गया है। भारत-दुर्दैव, भारत-दुर्दशा, सत्यानाश, रोग, आलस्य, मदिरा, अन्धकार, निर्लज्जता, आशा, डिसलॉयल्टी को पात्र के रूप में उपस्थित किया गया। भारत का प्रवेश कुत्तों, स्यारों और कौओं के बीच होता है। उन्हीं के अनुकूल इमशान, मैदान, टूटे-फूटे मन्दिर किताबखाना और ब्रिटिशों का साज-सज्जा से युक्त बैठक आदि अनेक उपयुक्त स्थानों की कल्पना की गयी है।
नाटक का प्रारम्भ मंगलाचरण से भिन्न स्तर पर होता है, पर्दे के पीछे नटरंग से एक योगी भारत के अतीत-वैभव की ओर संकेत करते हुए लावनी गाता है और वर्तमान भारत को दुर्दशा से तुलना करता है। समूची कथावस्तु स्थूल ढंग से छः अंकों में विभक्त है पर प्रत्येक अंक की कथा परस्पर अन्तर्सम्बद्ध है। यही कारण है प्रत्येक अंक का अंत जिज्ञासा-वृत्ति को जागृत रखता है कि आगे क्या होगा? साथ ही रसोद्रेक के स्थायी भाव की सृष्टि भी होती है। प्रथम अंक में योगी का लावनी गान भारतीय राजाओं की परस्पर फूट और कलह के कारण यवन राज्य की स्थापना और फिर ब्रिटिश राज का होना वर्णित है।
भारतीयों की दुरवस्था और अंग्रेजो द्वारा किये गये आर्थिक शोषण का वर्णन है। एक और अविद्या, दुःख, कलह, आलस्य, महंगाई, रोग-टैक्स आदि की मार से भारतवासी दुःखी है दूसरी ओर अंग्रेजी-राज में आयी सुख-शान्ति को देखकर विक्टोरिया महारानी को देवता-तुल्य मारकर स्तुति भी है। पर देशी घन का विदेश गमन चिंता का कारण भी बनता है। दूसरा अंक- दीनहीन भारत अपनी दुःख-गाथा वर्णित करते-करते मूर्छित हो जाता है।
आशा, निर्लज्जता के साथ आती है और भारत को उठाकर भीतर ले जाती है। तीसरा अंक-भारत-दुर्देव (अंग्रेजों का प्रतीक) आधा हिन्दुस्तानी और आधा मुसलमानी ड्रेस पहने हुए आता है। यही भारत-दुर्दशा का कारण है। जिनका सेनापति ‘सत्यानाशी फौज’ है। जिस फौज के कार्यकर्ता धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सभी स्तरों पर शोषण करते हैं।
फूट, सन्तोष, डाह, लोभ, भय, दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, स्वार्थपरता, अना-वृष्टि आदि के सहयोग से ही भारत-दुर्देव भारतीयों का नाश धन, बल, विद्या तीनों स्तरों पर कर रहा है। चतुर्थ अंक – लाही, टिड्डी, कीड़े, पाला, हैजा, डेंगू, एपिलेपसी, बहुदेववाद, छुआछूत, आलस्य, शराबखोरी, कलह, मोह अविद्या आदि सत्यानासी सेनापति के सिपाही हैं जिनका सहयोग ही भारतीय नाश का कारण है। पंचम-अंक-औपनिवेशिक शासन के सामाजिक आर्थिक शोषण से छुटकारा पाने के लिए भारत के पढ़े-लिखे लोग सात सभ्यों की कमेटी बनाते हैं।
इस कमेटी में सुरेन्द्रनाथ वैनर्जी, फिरोजशाह मेहता और जास्टिस रानाडे का भी जिक्र है। पर अंग्रेज शासक अपने ‘डिसलॉयल्टी’ का प्रयोग करके इंगलिश पालिसी नामक ऐक्ट के ‘हाकिमेच्छ’ नामक दफा से सबको पकड़ ले जाती है। षष्ठ अंक-अन्त में भारत-भाग्य अचेत पड़े हुए है। भारत उसे जगाने की चेष्टा करता है पर ‘भारत-भाग्य’ के उठने की आशा न देखकर ‘भारत’ अपनी छाती में कटार का आघात कर लेता है।
इस प्रकार इस नाटक का अन्त भी ‘भारत भाग्य’ के द्वारा न होकर दुःखान्त होता है जो भारतीय शास्त्रीय परम्परा के विपरीत है। इस नाटक के प्रारम्भ में ही मुख सन्वि बीज नामक अर्थप्रकृति और आरम्भ नामक कार्यावस्था का सम्यक् निर्वाह हुआ है। अन्त में भी निर्वहण सन्धि और कार्य नामक अर्थप्रकृति और फलागम नामक कार्यावस्था है। इसके अतिरिक्त तीसरे-चौथे अंक में बिन्दु अर्थ प्रकृति, प्रयत्न कार्यावस्था और प्रतिमुख सन्धि तथा पंचम अंक में ‘पताका’ अर्थ प्रकृति है जो प्रधान फल की प्राप्ति का द्योतक है।
इसी में प्राप्त्याशा, कार्यावस्था और गर्भ सन्धि भी मानी जा सकती है। यद्यपि नाव्य रासक में प्रतिमुख सन्धि का निषेध है फिर भी इस नाटक में प्रतिमुख सन्धि है क्योंकि तीसरे-चौथे अंकों में मुखसन्धि में दिए प्रधान फल का निदर्शन ही होता है। लेकिन विमर्श सन्धि इस रचना में नहीं है। नाटक में नवीन और प्राचीन तत्वों का समुचित निर्वाह हुआ है।
अतः ‘भारत-दुर्दशा’ में एक ओर ब्रिटिश राज की निर्ममता, शोषण का चित्र है तो दूसरी ओर भारतवासियों की काहिली, आलस्य और अशिक्षा भी कारण रूप में विद्यमान है। यही कारण है इन समस्त अन्तविरोधी स्थितियों से उबरने के लिए जरूरी था ‘सब लोग मिलकर एक चित्त हों’, विद्या की उन्नति करो, कला सीखो, जिससे वास्तविक कुछ उन्नति हो भारतेन्दु की इस प्रकार की आकाँक्षा थी कि यदि भारतीय जनता अपनी दुरवस्था से मुक्त होना चाहती है तो पहले उन्हें अपनी दुर्बलताओं से मुक्त होना होगा।
आत्मबोध को जागृत करना होगा । भारतेन्दु की यही प्रेरणा तत्कालिक दौर के लिए मूल्यवान थी क्योंकि उनका दौर जनसंघर्षों का निर्णायक दौर तो था नहीं। इसी कारण नाटक का जो निराशात्मक अन्त होता है जिसमें रचनाकार का जो नरमदली रुख प्रकट होता है वह भी सामयिक दृष्टि की सीमा ही थी। तब तक वस्तुपरक वैज्ञानिक चिंतन का इस रूप में विकास न हो सका था कि भारतेन्दु सीधे संघर्ष की चुनौती देते । फिर भी अपनी यथार्थपरक दृष्टि के तहत भारतीय-जन की दुर्दशा का चिन्त्र खींचा।
उनको अपने गौरवपूर्ण अतीत का स्मरण दिलाकर जागृत करने का ऐतिहासिक कार्य किया, यही भारतेन्दु की प्रगतिशीलता है। तत्कालीन परिवेश में सामाजिक जागृति के लिए भारतेन्दु ने उन्हीं प्रतीकों और बिम्बों को ग्रहण किया जिससे जनता परिचित थी ताकि वर्णित चीजें आसानी से उनकी चेतना का अंग बन सकें। यही कारण है प्राचीन मिथक का सहारा लेकर जन मानस की संवेदना के अनुरूप कृष्ण को ही ‘कल्कि’ के अवतार के रूप में दिखाया । ताकि कृष्ण से परिचित भारतवासी ‘कल्कि’ के रूप में समझ सकें- “जय सत युग व्यापन करन । नासन म्लेच्छ आचार। कठिन धार तरवार कर । कृष्ण कल्कि अवतार।”
अंग्रेजी राज का मुख्य मकसद भारतीयों का छड़ीक शोषण करना था। उन्होंने जो शिक्षा प्रदान कीं या रेल-तार का विस्तार, उद्योग-धन्धों की स्थापना, सब कुछ अपने लक्ष्य-पूति हेतु हो किया। इस शोषण से छुटकारा पाने के लिए जरूरी था कि भारतीय जनता जागृत हो विदेशी शासन से मोर्चा लें। अतः भारतेन्दु बड़े व्यंग्यात्मक ढंग से तत्कालीन धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को उपस्थित कर औपनिवेशिक शासन की पोल खोलकर रख दी।
‘भारत-दुर्दशा’ नाटक में भी सभ्य व्यक्तियों की कमेटी द्वारा जिनमें बंगाली एडिटर, कवि आदि के रूप में समाज का जागरूक वर्ग सम्मिलित था। इस वर्ग ने सामाजिक बदलाव की जरूरत महसूस करते हुए एक सभा का आयोजन किया जिसमें राष्ट्रीय उत्थान के विषय में चिन्ता व्यक्त करते हुए अध्यक्ष कहते हैं-“सम्यगण आज की कमेटी का उद्देश्य यह है कि-‘भारत-दुर्देव की सुना है कि हम परं चढ़ाई है। इस हेतु आपलोगों को उचित है कि मिलकर ऐसे उपाय सोचिये कि जिससे हम लोग आपत्ति से बचें। जब तक हो सके अपने देश की रक्षा करना हो हम लोगों का मुख्य धर्म है। आशा है कि आपलोग अपनी-अपनी अनुमति प्रकट करेंगे ।”
इसके उपाय में कुछ राष्ट्रीय योजनायें प्रस्तुत की गयीं । जैसे-अखबारों के अस्त्र, स्पोचों के गोले, कमेटी की फौज, एडूकेशन की सेना तैयार करने, हिन्दुस्तानी कपड़े तैयार करने और शिक्षा का प्रसार आदि । स्वदेश प्रेम की भावना और स्वदेशी वस्तुओं का व्यवहार ही अब ब्रिटिश राज के आक्रमण से उद्धार कर सकेगी। अधिकांशतः भारत नवशिक्षित वर्ग पश्चिमी जगत की सभ्यता और संस्कृति की चका-चौध में मार्ग भ्रष्ट हो गया, और शेष जो बडा भाग बचा रहता है वह रूदियों अन्धविश्वासों से ग्रस्त अन्धकारमय जीवन व्यतीत कर रहा था। ऐसे में देश की बहुतायत जनता के बीच स्वदेश प्रेम और आत्मौरव का भाव जागृत करना नितान्त आवश्यक था तभी औपनिवेशिक शासन से छुटकारा संभव था ।
इस प्रकार स्वयं भारतेन्दु और भारतेन्दु मण्डल के रचनाकारों ने तत्कालीन आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक स्थिति को गहराई से आँका । आर्थिक वैमनष्य के कारण उत्पन्न अकाल की स्थिति, मँहगाई, महामारी, दरिद्रता आदि अनेकशः चित्र खींचा। भारत माता इस दुर्गति से कितनी दीन-हीन हो गई है, उसके उद्धार के लिए, उसके करुण क्रन्दन के माध्यम से भारतीय जनमानस को सजग करने का प्रयास मिलता है। यद्यपि भारतेन्दु ने महारानी विक्टोरिया और उसके शासन काल में हुए सुवार-कार्यों की प्रशंसा की।
जिससे उनका राजभक्त वाला रूप उजागर होता है पर यह सब युगीन अन्वैविरोध का हो परिणाम है। एक और स्तुत्ति करते हैं, उन्हें अम्ब, माँ, ‘देवि’ का सम्बोधन देते हैं। सुधार के लिए प्रार्थना करते हैं पर वहीं उनकी दृष्टि तुरंत आर्थिक वैमनष्य की ओर चली जाती है-” अंगरेज राज सुख साज सजे सब भारी । पैवन विदेस चलि जात इहै अति ख्वारी।” अपने धन को विदेश जाते देखकर भारतेन्दु असह्य हो उठते हैं। यद्यपि उपरोक्त पंक्तियों में भी राज-भक्ति और देशभक्ति का अन्तर्विरोध है। पर मूलभावना द्वितीय पंक्ति में ही मुखरित हुई है।
यही वह मूल कारण है जो देश को दरिद्रता और मंहगाई के गर्त में ढकेल रहा है। लिखते हैं- ‘ताहू पै मंहगी काल रोग बिस्तारी। दिन-दिन दूने दुःख ईस देत हा-हा री। सबके ऊपर टिक्कस की आफत आयो। हा-हा भारत-दुर्दशा देखी म जाई ।
‘आज भी चतुर्दिक मंहगाई, भ्रष्टाचार, घूसखोरी, चापलूसी का माहौल निर्मित है। आज की साम्राज्यवादी पूजी के आधार पर भारतवर्ष में जो उद्योगधन्धे चालू हैं, वे कहीं न कहीं अभी भी भारतीय मानसिकता को गुलामी की जंजीर में जकड़े हुए है। ऐसी स्थिति में स्वातंत्रोत्तर भारत में भी भारतेन्दु की ये पंक्तियाँ माहौल को जीवंत बनाती दीखती है। आज भी मनमाना टैक्स लगाकर जो घन जनता से जबरदस्ती वसूल किया जाता है उससे भारतीयों के प्रेमभाव और एकता का नाश हो गया है।
भारतेन्दु जब विक्टोरिया शासन के वास्तविक शोषक रूप को पहचान लेते हैं। तो उसके दगेपन, घुतता और चालाकी का निर्ममता से पर्दाफाश भी करते हैं। इस शासन की पुलिस व्यवस्था, कचहरी, शिक्षा आदि की कलई खोलकर रख देते है। भारतीय जन चेतना को आक्रान्त किये अन्धविश्वासों और विक्टोरिया शासन पर किये भरोसे का स्वयं ही मखौल भी उड़ाते हैं।
‘भारत’ के मुख से भारतेन्दु कहलवाते हैं- हाय, परमेवर बैकुण्ठ में और राजराजेश्वरी सात समुद्र पार, अब मेरी कौन दशा होगी ? हाय ! अब मेरे प्राण कौन बचावेगा ? जब ईश्वर बैकुण्ठ में हैं और रानी सात समुद्र पार तो फिर रक्षा कौन करेगा ? ऐसे में भारतीयों को बताते हैं कि तुम्हारी एक जुट शक्ति ही तुम्हारा उद्धार कर सकती है। उनकी आत्मचेतना को बार-बार जगाने का प्रयत्न करते हैं। यह भारत की विपन्न दशा के प्रति रचनाकार का गहरा बोध ही है जिसके तहत देश की गुलामी की पीड़ा को गहराई से महसूस किया ।
इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हैं भारतीयों की काहिली, अशिक्षा, परस्पर का वैमनस्य द्वेष आदि सामाजिक और वैयक्तिक कुण्ठाओं को। स्पष्ट रूप से कहते हैं- “यदि हम अपनी गौरवशाली सांस्कृतिक धरोहर का स्मरण कर वर्तमान में सचेतन बने तो निश्चय ही भारत के भाग्य का उदय होगा। अतोतकाल में भारत जो इतना समुन्नत था वही भारत अपनी नैतिक और सामाजिक विकृतियों के कारण हेय स्थिति को प्राप्त कर गया है।” वे प्रश्न उठाते हैं – हाय ! यह वही भारतभूमि है जहाँ साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण के दूतत्व करने पर वीरोत्तम दुर्योधन ने कहा था- ‘सूच्याग्रम् नैव दास्यामि बिना युद्धं केशव ।
‘और आज वही भारतभूमि श्मशान हो रही है। अरे ! यहाँ की योग्यता, विद्या, सम्यता, उद्योग, उदारता, धन, बल, माम, दृढ़ निश्चितता सत्य कहाँ गये ? आज भारतीय इतने अकर्मण्य क्यों हो गये ? कहाँ गया उनका वह बीर भाव। कदाचित् इन महापुरुषों और वीरों का स्मरण कराकर अपने देश और जाति के प्रति स्वामिमान की भावना जगाना ही भारतेन्दु का लक्ष्य रहा ।
ताकि एक वार पुनः भारतवासी जागृत हो अपनी अस्मिता पहचान सकें, स्वत्व हासिल कर सकें। इसके लिए हिन्दू-मुस्लिम सभी धर्म वाले जब एकजुट होकर साम्राज्यवादी ताकतों के विरुद्ध आवाज उठायें तभी उससे मुक्ति मिल सकती है। आपसी फूट और कलह भी भीतर से कमजोर और खोखला बना देती है और फूट का नाजायज फायदा उठाकर लोगों के बीच धार्मिक विद्वेष फैलाते थे। लिखते है – यह समय इन झगड़ों का नहीं, हिन्दू, मुसलमान जैन सब आपस में मिलिए ।
ब्रिटिश-राज्य तो भारतीयों को असहाय और पंगु बना राज्य रूप से शोषण में संलग्न रहा है। भारत-दुर्देव कहता है- “कौड़ी-कोड़ी को करू मैं सबको महताज । भूले प्राण निकालूं इनका तों में सच्चा राज।” साथ ही देश के उद्धार को बात करने वाले लोगों को ‘डिसलायल्टी’ के तहत इंग्लिश पालिसी नामक एक्ट के ‘हाकिमेच्छा’ नामक दफा के अनुसार पकड़ लेती है। ‘हाकि मेच्छा’ में छिपा व्यंग्य निश्चय हो भारतेन्दु के प्रखर स्वाधीन चेतना का बोचक है। फिर भी समग्रता में भारतेन्दु का नजरिया सुधारवादी हो रहा है।
भारतीयों की दुर्दशा के कारणभूत एक-एक तत्व पर आक्षेप करते हैं। भारतीयों को निष्क्रियता, मिथ्या, अहंकार पर चोट करते हुए शांकर वेदान्त पर भी आक्षेप किया जिसने भारतीयों को ब्रह्मोन्मुख होने की प्रेरणा दी। संसार को मिथ्या घोषित जगत के प्रति उनके लगाव को कम किया। जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक चिंतन की गति भी कुछ हद तक अवरुद्ध हुई। लोग ज्ञानी बनकर रूक्ष और स्नेह शून्य हो गये। अतः जबतक भारतीय जनता इस जड़ता और बुराइयों से छुटकारा लेकर राष्ट्रीय और सामाजिक चेतना के उच्च धरातल पर प्रतिष्ठित नहीं होती तबतक देश का उद्धार सम्भव नहीं ।
इस प्रकार भारतेन्दु का यह नाटक निश्चय ही राष्ट्रीय कोटि का नाटक है जहाँ बड़े सजीव रूप से देश की विविध समस्याओं को चित्रित किया गया फिर भी पूरे रचाव में नाटक उतना सशक्त नहीं बन पाया है जितना कि अलग-अलग अंकों में। पाँचवे अंक में यथार्थ का जितना सशक्त चित्रण हुआ है, नाट्यस्थिति, भाषा, संवाद और पात्र का एकजुट प्रभाव जितना आकर्षित करता है उतना सम्पूर्ण नाटक के धरातल पर इन नाट्य-तत्वों का संयोजन समुचित रूप में नहीं हो सका है।
इसी प्रकार जब अंतिम अंक में भारत-भाग्य को अचेत देखकर कटार मारकर आत्महत्या कर लेता है तो यह नाटकीयता को चरम स्थिति है। यद्यपि नाटक का यह अन्त भारतीय परम्परा के अनुकूल नहीं है पर भारतेन्दु का मानना है कि इसका दर्शकों के चित्त पर देर तक असर रहता है। यद्यपि यह नाटक कथ्य को संप्रेष्य करने में पूरी तौर पर सफल है पर नाटकीय कलाओं का सफल प्रयोग नहीं हो सका है। इसका नाट्य-धरातल पर नये-नये प्रयोगों को करते रहना।
फिर भी कलागत प्रयोगों के हेतु ही नाटकों की रचना नहीं की युगीन सत्य को कारण है बराबर भारतेन्दु ने सिर्फ वरन् वे बराबर नयी-नयी आधार भूमि खोजते रहे ताकि कर सकें । विभिन्न प्रयोगों के द्वारा वे तल्खी के साथ व्यक्त तीखे ढंग से भारत य जागृत कर देशभक्ति और आत्माभिमान अधिक से अधिक अन्धविश्वासी, रूढिबद्ध, जड़ समाज को के भाव को भरना चाहते थे। यही कारण है संस्कृत, पारसी, अंग्रेजी नाटकों से यथास्थान लाभ उठाते हैं पर उनकी दृष्टि इस स्तर संतुलित और व्यावहारिक रही। अतः पूर्व में प्रयोग में आनेवाली विभिन्न रंगशैलियों के सम्मिश्रण के बावजूद नाट्यकृति कमजोर नहीं है, नाट्य तत्वों की दृष्टि से कुछ शिथिल अवश्य है।
नाटक की भाषा पात्रानुकूल, विषय के अनुरूप सरल, चपल और प्रवाह-पूर्ण है। बीच-बीच में गीतों की योजना से नाटक में जीवंतता आयी है। इन गीतों के माध्यम से अंग्रेजों की अर्थनीति और कूटनीति का सशक्त चित्र उभरा है। वस्तुतः नाटकों में गोति-योजना यह भारतेन्दु युग में संस्कृत नाटकों की परम्परा में जन्मीं। क्योंकि संस्कृत के नाटकों में बीच-बीच में श्लोकों की
रचना अनिवार्य अंग के रूप में स्वीकृत हो चुकी थो। इसी परम्परा में गीतों की योजना के साथ नाट्य-रचना प्रसाद तक चली। बीच के दौर में गीतों से हटने की प्रवृत्ति भी मिलती है लेकिन यदि नाटक किसी मकसद को लेकर लिखा जायेगा तो विचार और भाव को गहराने के लिए आवश्यकतानुसार गीतों का सन्निवेश भी होना चाहिए। व्रस्त ने भी नाटकों में गीतों का प्रयोग किया है। नाटकीय प्रभाव को घनीभूत करने के लिए आवश्यक भी है।
आज नुक्कड़ नाटकों में भी जरूरत पड़ने पर गीतों का प्रयोग होता है क्योंकि यह लोगों तक अपनी बात पहुँचाने का प्रभावी माध्यम भी रहा है। पर इनकी भरमार रचना में नहीं होनी चाहिए कि प्रवाह या कथ्य ही कमजोर पड़ जाये ।
‘भारत-दुर्दशा’ नाटक में गति देने में सहायक हुई है। अतिरंजना और अतिनाटकीयता पैदा कर देता है। दें तो रंगमंच की दृष्टि से, अभिनेयता की दृष्टि से होगा। करुण और वीररस की व्यंजना इस जहाँ भारत दुर्दैव का उत्साह प्रदर्शित होता है वहाँ वीर और जहाँ भारत-भाग्य का दुर्दिन, उसका विलाप है, वहाँ करुण रस की सृष्टि हुई है। बीच-बीच में व्यंग्यात्मक लहजे में हास का पुट भी आया है।
व्यंग्य-विनोद और हास-परिहास को तो पूरे नाटक में ब्रिटिश राज के प्रति अपनी तीखी प्रतिक्रिया को प्रकट करने के लिए कारगर औजार के रूप में इस्तेमाल किया गया है। वैसे व्यंग्यात्मक लहजे में अपनी बात को रखना यह पूरे भारतेन्दु-युग की ही खासियत रही है। साथ ही प्रतीकों का भी सजीव और विस्मृत न होनेवाला रूप उपस्थित किया है। संवाद-योजना भी अच्छी बन पड़ी है, कथ्य का परन्तु स्वगत-कथनों का लम्बा विस्तार नाटक में यदि इनका रूप छोटा कर भी यह नाटक सफल सिद्ध नाटक में विशेष रूप से हुई है।
इस प्रकार सामयिक यथार्थ-बोध को लेकर जिन सामाजिक नाटकों की रचना भारतेन्दु ने की है वे निश्चय ही पाश्चात्य नाटककार व्रस्त के सन्निकट है, जिनमें सामाजिक बदलाव की ताकत निहित है। नवीन प्रयोगों के घरातल पर बुने गये इनके नाटकों में आज भी विकास की संभावनायें हैं।
वस्तुतः भारतेन्दु ऐसे नाटकों के पक्षघर बनकर उपस्थित होते है जो नाटकों की सामाजिक सोद्देश्यता और जीवन की कलात्मक प्रस्तुति पर बल देते हैं ताकि जनता की चेतना उन्नत और विकसित हो सके, विभिन्न प्रकार को कलात्मक चकाचौंध के स्थान पर एक सजगता पैदा हो, जागृति लाये । आज के नाटककारों के लिए भी भारत दुर्दशा नाटक प्रेरणास्रोत बन सकता है। जनपक्षीय नाट्य-परंपरा के विरासत के रूप में भारत-दुर्दशा नाटक को प्रस्तुति हो सकती है।
~दीनबंधु, बीए.आनर्स (हिन्दी), ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज
दीवार में एक खड़की रहती थी — समीक्षा…https://www.bhojkhabar.com/%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%96%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%a5%e0%a5%801825-2/